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उत्तराखंड में जल्द लागू होगा सख्त भूमि कानून, कमेटी ने सौंपी 80 पेज की रिपोर्ट, 23 सिफारिशें.

 
  • Admin
  • 05 Sep 2022
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उत्तराखंड में भूमि कानून पर बनी कमेटी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट मिलने के बाद सीएम ने कहा कि भूमि कानून से जुड़े सभी पक्षों की राय लेकर वह राज्य के विकास और राज्य की जनता के कल्याण के लिए फैसले लेंगे।

देहरादून: उत्तराखंड में भूमि कानून पर बनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को सौंप दी है. रिपोर्ट मिलने के बाद सीएम ने कहा कि भूमि कानून से जुड़े सभी पक्षों की राय लेकर हम राज्य के विकास और राज्य की जनता के कल्याण के लिए फैसला लेंगे। समिति ने राज्य के हित में निवेश की संभावनाओं और जमीन की अनियंत्रित खरीद-बिक्री के बीच संतुलन स्थापित करते हुए अपनी 23 सिफारिशें सरकार को दी हैं।

80 पन्ने की रिपोर्ट तैयार: समिति ने राज्य के इच्छुक दलों, विभिन्न संगठनों, संस्थानों से सुझाव आमंत्रित कर करीब 80 पन्नों की अपनी रिपोर्ट तैयार की है। इसके अलावा समिति ने प्रदेश में अब तक दी गई जमीन की खरीद को मिली मंजूरी का ब्योरा मांग कर सभी जिलाधिकारियों से भी पूछताछ की है. समिति ने अपनी सिफारिशों में ऐसे बिंदुओं को शामिल किया है, जिससे राज्य में विकास के लिए निवेश बढ़ेगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। साथ ही भूमि के अनावश्यक दुरूपयोग को रोकने की भी सिफारिश की गई है।

समिति ने हिमाचल प्रदेश जैसे कुछ प्रावधानों को वर्तमान उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि निपटान अधिनियम, 1950) में जनता की भावनाओं के अनुसार संशोधित और लागू होने की सिफारिश की है।

वर्तमान में, कृषि या बागवानी उद्देश्यों के लिए कृषि भूमि खरीदने के लिए जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अनुमति दी जाती है। कुछ मामलों में ऐसी अनुमति का दुरूपयोग रिसोर्ट/निजी बंगले बनाकर किया जा रहा है न कि कृषि/बागवानी उद्देश्यों के लिए, जिससे लोग पहाड़ी क्षेत्रों में भूमिहीन हो रहे हैं और रोजगार भी नहीं बन पा रहे हैं। समिति ने सिफारिश की है कि इस तरह की अनुमति जिला स्तर से नहीं दी जानी चाहिए और सरकार से ही अनुमति का प्रावधान होना चाहिए. हिमाचल प्रदेश की तरह ये अनुमतियां न्यूनतम भूमि आवश्यकता के आधार पर शासन स्तर से प्राप्त की जानी चाहिए। वर्तमान में राज्य सरकार द्वारा आवेदक संगठन/फर्म/कंपनी/व्यक्ति को औद्योगिक उद्देश्यों, आयुष, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, बागवानी एवं विभिन्न प्रसंस्करण, पर्यटन, पहाड़ी एवं मैदानी क्षेत्रों में कृषि के लिए  उसके आवेदन 12.05 एकड़ से अधिक भूमि दी जा सकती है। 

उपरोक्त प्रचलित व्यवस्था को समाप्त करते हुए हिमाचल प्रदेश की तरह न्यूनतम भूमि आवश्यकता (अनिवार्यता प्रमाण पत्र) के आधार पर देना उचित होगा। बड़े उद्योगों के अलावा सरकारी स्तर से अनिवार्यता प्रमाण पत्र के आधार पर सिर्फ 4-5 स्टार होटल/रिसॉर्ट, मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल, वोकेशनल/पेशेवर संस्थान आदि को ही जमीन खरीदने की अनुमति दी जानी चाहिए. समिति केवल अन्य प्रयोजनों के लिए पट्टे पर भूमि उपलब्ध कराने की व्यवस्था लाने की अनुशंसा करती है। वर्तमान में गैर-कृषि प्रयोजन के लिए खरीदी गई भूमि को एसडीएम धारा-143 के तहत गैर-कृषि घोषित कर 10 दिनों में खतौनी में पंजीकृत किया जाएगा। लेकिन, क्रय अनुमति आदेश में 2 वर्ष में निर्धारित उद्देश्य के लिए भूमि का उपयोग करने की शर्त है। यदि भूमि राज्य सरकार में निहित होगी यदि उसका उपयोग निर्धारित अवधि के भीतर या किसी अन्य उपयोग/बिक्री के लिए नहीं किया जाता है, तो वह भी शर्त में उल्लिखित रहता है। यदि गैर-कृषि उद्देश्य के लिए खरीदी गई कृषि भूमि को 10 दिनों के भीतर "गैर-कृषि" घोषित किया जाता है, तो इसे धारा 167 के तहत राज्य सरकार (उल्लंघन के मामले में) में निहित नहीं किया जा सकता है।

एक व्यक्ति अपने या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम पर बिना अनुमति के अपने जीवनकाल में आवासीय उद्देश्य के लिए अधिकतम 250 वर्ग मीटर भूमि खरीद सकता है। समिति की सिफारिश है कि परिवार के सभी सदस्यों के नाम से अलग जमीन की खरीद को रोकने के लिए परिवार के सभी सदस्यों के आधार कार्ड को राजस्व रिकॉर्ड से जोड़ा जाना चाहिए। राज्य सरकार को अधिनियम में 'भूमिहीन' को परिभाषित करना चाहिए। समिति का सुझाव है कि 'भूमिहीन' की परिभाषा के लिए पहाड़ी क्षेत्र में कम से कम 5 और मैदानी क्षेत्र में 0.5 एकड़ को उचित ठहराया जाएगा। जिला/मंडल/सरकारी स्तर पर जिस उद्देश्य के लिए भूमि खरीदी गई थी, उसके उल्लंघन को रोकने के लिए। टास्क फोर्स का गठन किया जाए। ताकि ऐसी जमीन को राज्य सरकार में निहित किया जा सके। सरकारी विभागों को अपनी खाली जमीन पर साइन बोर्ड लगाने चाहिए। कुछ मामलों में कुछ लोगों द्वारा एक साथ जमीन खरीद ली जाती है और अगर दूसरे व्यक्ति की जमीन के बीच में पड़ जाती है तो उसका रास्ता बंद हो जाता है, इसके लिए राईट ऑफ वे का प्रावधान होना चाहिए।

विभिन्न प्रयोजनों के लिए खरीदी जाने वाली भूमि में समूह 'ग' एवं समूह 'घ' श्रेणी के स्थानीय लोगों को 70% रोजगार आरक्षण सुनिश्चित किया जाए, योग्यता के अनुसार उच्च पदों को वरीयता दी जाए। विभिन्न अधिसूचित प्रयोजनों के लिए दी जाने वाली अनुमतियों के संबंध में आवेदक इकाइयों/संस्थाओं द्वारा नियोजित स्थानीय लोगों की संख्या की सूचना शासन को उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाये।

फिलहाल जमीन खरीदने के बाद जमीन के इस्तेमाल के लिए दो साल की अवधि तय की गई है और राज्य सरकार को अपने विवेक के मुताबिक इसे बढ़ाने का अधिकार दिया गया है। इसमें संशोधन करके विशेष परिस्थितियों में यह अवधि तीन वर्ष (2 + 1 = 3) से अधिक नहीं होनी चाहिए। पारदर्शिता के लिए खरीद-बिक्री, भूमि हस्तांतरण और स्वामित्व से संबंधित सभी प्रक्रिया ऑनलाइन होनी चाहिए। पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक डोमेन में एक वेबसाइट के माध्यम से की जानी चाहिए। सिडकुल/औद्योगिक सम्पदाओं में खाली पड़े औद्योगिक संयंत्रों/कारखानों की भूमि का आवंटन प्राथमिकता के आधार पर औद्योगिक प्रयोजन हेतु किया जाये।

राज्य में एक साल का बंदोबस्त हो चुका है, जनहित में भूमि बंदोबस्त की प्रक्रिया शुरू की जाए। जिला एवं शासन स्तर पर भूमि क्रय अनुमतियों का नियमित अंकन एवं इन अभिलेखों का रख-रखाव होना चाहिए। यदि कोई भूमि धार्मिक प्रयोजन के लिए खरीदी/निर्माण की जाती है तो जिलाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर शासन स्तर से निर्णय लिया जाना चाहिए। जब भी राज्य में भूमि व्यवस्था के संबंध में कोई नया अधिनियम/नीति/भूमि सुधार कार्यक्रम शुरू किया जाता है, तो राज्य के इच्छुक पार्टियों/लोगों से सुझाव प्राप्त किए जाने चाहिए। नदियों, नालों, वन क्षेत्रों, चरागाहों, सार्वजनिक भूमि आदि पर अवैध रूप से कब्जा/निर्माण करने वालों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। संबंधित विभागों के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का भी प्रावधान होना चाहिए। ऐसे अवैध कब्जे के खिलाफ राज्यव्यापी अभियान चलाया जाना चाहिए।

क्या है भू कानून समिति: भूमि विधि समिति में अध्यक्ष सहित कुल पांच सदस्य होते हैं। इसमें समिति के अध्यक्ष पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार हैं। दो सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डीएस गरब्याल और अरुण कुमार ढौंडियाल सदस्य के रूप में शामिल हैं। जनसांख्यिकीय बदलाव की शिकायत करने वाले अजेंद्र अजय भी इसके सदस्य हैं। दूसरी ओर, राजस्व सचिव आनंद वर्धन वर्तमान में इस समिति में सदस्य सचिव के रूप में हैं।

उम्मीद है कि समिति द्वारा सरकार को जो रिपोर्ट सौंपी जाएगी उसमें हिमाचल के भूमि कानून की कुछ झलक भी देखने को मिल सकती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उत्तराखंड में हिमाचल की तर्ज पर नया कानून बनाने की मांग की गई है। समिति के अध्यक्ष पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार हिमाचल के रहने वाले हैं। इतना ही नहीं इस कमेटी की ओर से हिमाचल के भूमि कानून का अध्ययन किया गया है। इस कानून के लिए मांगे गए सुझावों पर समिति से करीब 200 सुझाव प्राप्त हुए। उनमें से अधिकांश में, उत्तराखंड के समान भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हिमाचल के भूमि कानून को राज्य में लागू करने के लिए सुझाव प्राप्त हुए थे।

हिमाचल का भू कानून: हिमाचल में भूमि कानून बहुत सख्त है। यहां जमीन की खरीद-फरोख्त के लिए सख्त नियम बनाए गए हैं। खासकर कृषि भूमि के क्रय-विक्रय के नियम बहुत कठिन हैं। इसमें कृषि भूमि केवल किसान ही खरीद सकता है। इसमें वह किसान भी है जो लंबे समय से हिमाचल में रह रहा है। उत्तराखंड में 90 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। खास बात यह है कि राज्य की स्थापना के समय करीब 7.8 से चार लाख हेक्टेयर कृषि भूमि थी। अब केवल 6.48 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बची है। इस तरह अब तक करीब 1.22 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि कम हो चुकी है, जो बेहद चिंता का विषय है। इसलिए कृषि भूमि के क्रय-विक्रय के संबंध में विशेष नियमों की आवश्यकता है।

राज्य गठन से है सख्त भू कानून की मांग: वैसे उत्तराखंड के लिए भूमि कानून कोई नया मुद्दा नहीं है। राज्य की स्थापना के बाद भूमि कानून की मांग उठने लगी। उस दौरान राज्य में उत्तर प्रदेश का भूमि अधिनियम लागू रहा। राज्य बनने के बाद जमीन की खरीद-फरोख्त बहुत तेजी से शुरू हुई। इसे देखते हुए भूमि कानून को लेकर एनडी तिवारी सरकार में कुछ संशोधन किए गए। उत्तराखंड दो अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़ा हुआ है। यहां 71 प्रतिशत वनों के साथ 13.92 प्रतिशत मैदानी क्षेत्र है, जबकि 86% पर्वतीय क्षेत्र है।

एनडी तिवारी सरकार ने वर्ष 2003 में उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि व्यवस्था सुधार अधिनियम 1950 की धारा 154 में संशोधन किया। इसमें राज्य के बाहर के लोगों को आवासीय उपयोग के लिए 500 वर्ग मीटर जमीन खरीदने की अनुमति देने का नियम तय किया गया था। इतना ही नहीं कृषि भूमि की खरीद पर सशर्त रोक लगा दी गई थी। वहीं जिलाधिकारी को 12.5 एकड़ तक की कृषि भूमि की खरीद की अनुमति देने का अधिकार दिया गया। उद्योगों की दृष्टि से शासन से अनुमति लेकर भूमि क्रय करने की व्यवस्था की गयी। इतना ही नहीं जिस प्रोजेक्ट के लिए 2 साल में जमीन ली गई है उसे पूरा करने की शर्त भी रखी गई है। हालांकि बाद में इसमें कुछ ढील दी गई थी।

इसके बाद भी भूमि कानून का मामला शांत नहीं हुआ और राज्य में राज्य के बाहर के लोगों द्वारा बड़ी मात्रा में जमीन खरीदने का मामला भी राजनीति में देखने को मिला। इसलिए खंडूरी सरकार ने 500 वर्ग मीटर की अनुमति को घटाकर 250 वर्ग मीटर करते हुए नियमों में कुछ और सख्ती की। हालांकि त्रिवेंद्र सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए साल 2018 में खंडूरी सरकार के इस नियम को खत्म कर दिया था। जिसके बाद राज्य में बाहर से आने वाले लोगों को जमीन खरीदने की पूरी आजादी मिली।

धामी सरकार से उम्मीदें: अब एक बार फिर से भूमि कानून को लेकर प्रदेश की धामी सरकार पर जबरदस्त दबाव है। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कुछ सख्त नियम बना सकती है। वैसे राज्य में आवासीय रूप से बाहर से आने वाले लोगों के लिए पूरी तरह से प्रतिबंध रहेगा। इसकी संभावना कम ही है। इसलिए जो लोग राज्य से बाहर रहते हैं, उन्हें उत्तराखंड के शांत वादियों में जमीन खरीदने का मौका मिलेगा, लेकिन अगर समिति सख्त नियम बनाने की सिफारिश करती है और सरकार इसे लागू करती है, तो कुछ समस्या हो सकती है।

 

 

 

 

 

 
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