उत्तराखंड में एक बार फिर नए जिलों के गठन का मुद्दा गरमाने लगा है। विधानसभा अध्यक्ष रितु खंडूरी ने भी कोटद्वार को नया जिला बनाने की मांग की है। ऐसे में अब सरकार पर भी दबाव बढ़ गया है। वहीं, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अब इस मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों से सलाह मशविरा कर कुछ नए फैसले लेने की बात कह रहे हैं।
देहरादून: उत्तराखंड में नए जिले बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन कांग्रेस या भाजपा दोनों सरकारों ने नए जिलों की बात ठंडे बस्ते में डाल दी। हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक बार फिर नए जिले बनाने की मांग पर विचार करने को कहा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि नए जिलों की मांग लंबे समय से की जा रही है. सरकार जल्द ही इस पर विचार करेगी कि क्या राज्य में पुनर्गठन किया जा सकता है। दरअसल, नए जिले की जरूरत है, इस पर सभी जनप्रतिनिधियों से चर्चा की जाएगी. इस दिशा में चर्चा को आगे बढ़ाया जाएगा।
वर्ष 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने 4 जिलों के निर्माण की घोषणा की थी। इसमें गढ़वाल संभाग में 2 जिले (कोटद्वार, यमुनोत्री) और कुमाऊं मंडल में 2 जिले (रानीखेत, दीदीहाट) बनाने की बात कही गई. लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के इस्तीफा देते ही मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
इतना ही नहीं इसके बाद विजय बहुगुणा की सरकार ने राजस्व परिषद की अध्यक्षता में नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन का मामला आयोग को सौंप दिया. साल 2016 में मुख्यमंत्री बदलने के बाद हरीश रावत सत्ता में आए और उन्होंने एक बार फिर से 8 नए जिले बनाने की कवायद शुरू की और एक नया राजनीतिक दांव खेला। नए 8 जिले (दीदीहाट, रानीखेत, रामनगर, काशीपुर, कोटद्वार, यमुनोत्री, रुड़की, ऋषिकेश) बनाने का खाका भी तैयार किया गया, लेकिन सभी राजनीतिक दिखावा साबित हुए।
2016 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री रहे हरीश रावत ने नए जिलों के गठन के लिए 100 करोड़ की व्यवस्था करने की बात कही थी। हालांकि, इसके बाद कांग्रेस में सियासी उठापटक शुरू हो गई और 4 जिलों की मांग को फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व में नए जिलों के गठन के लिए गठित आयोग ने प्रत्येक नए जिले के निर्माण में करीब 150 से 200 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था। यानी उस दौरान 4 नए जिले बनाने की बात चल रही थी। इसलिए अगर उस दौरान चार नए जिले बनते तो राज्य पर करीब 600 से 800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता।