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क्या कहता है यूपीएससी का पैटर्न? चयनात्मक के बजाय छात्र व्यापक अध्ययन करें, आयोग यही चाहता है.

 
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  • 17 Jun 2023
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हाल ही में भारतीय सिविल सेवा परीक्षा 2022 के रिजल्ट आए और इसके ठीक बाद सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा 2023 पूरी हुई। रिजल्ट और एग्जाम को लेकर कुछ चर्चाएं और कुछ सवाल सामने आए हैं। पहली, परीक्षा में महिला कैंडिडेट्स को मिली बड़ी कामयाबी। कुल सफल 933 कैंडिडेट्स में से 320 लड़कियां हैं। टॉप 25 में भी 14 लड़कियां हैं, जिनमें एक टॉपर भी शामिल है। दूसरा, हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं में कामयाबी का ग्राफ ऊपर जाना। इस साल हिंदी मीडियम से सर्वाधिक 54 कैंडिडेट्स सफल हुए, जबकि पिछले बरस यह संख्या 24 थी। इनमें अन्य भारतीय भाषाओं के कैंडिडेट्स को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 79 हो जाती है।

बदलावों का एक दशक

जहां तक बदलाव की बात है तो यह 2013 के बाद से लगातार दिख रहा है और 2023 की प्रारंभिक परीक्षा में भी देखा गया। UPSC की रणनीति यह लगती है कि कैंडिडेट्स सिलेक्टिव स्टडी के बजाय कॉम्प्रिहेंसिव स्टडी करें और करंट (समसामयिक) के बजाए कंटेंपरेरी (समकालीन) पर फोकस करें। 2023 के प्री-एग्जाम खास तौर पर इसका संकेत देते हैं। इसमें करंट की बजाय कंटेंपरेरी मुद्दों को उठाया है, जो कोर्स की किताबें पढ़ने से ही हल हो सकते हैं।

  • पहले क्वेश्चन पेपर केवल कांसेप्चुअल होता था, लेकिन इस बार उसमें इंफॉर्मेशन, कॉन्सेप्ट, स्टैटिक सब्जेक्ट का प्रभाव ज्यादा है। इस बार एलिमिनेटिंग मेथड को भी छोड़ दिया गया है।
  • एक और पक्ष मुख्य परीक्षा (मेन्स) का है। इसे ठीक से देखें तो अब चीजें इंटर डिसिप्लिनरी अधिक हैं। यही सिलेक्टिव स्टडी वालों के लिए मुसीबत बनी। आप एक विषय को जाने बिना दूसरे में भी अच्छा नहीं कर सकते, यह सिद्धांत इसमें प्रभावी दिखा।

साफ है कि UPSC परफेक्शन चाहता है, हालांकि इसके लिए जिन पैरामीटर्स पर वह चल रहा है वे अव्यावहारिक हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि परफेक्ट तो उसका एग्जाम पैटर्न भी नहीं है। खासकर, सीसैट और वैकल्पिक विषय सिस्टम। इस परीक्षा में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की बात करें तो 21वीं सदी के दौर में हिंदी भी ग्लोबल बनी, लेकिन UPSC में वह पीछे खिसक गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दौर में वोकल फॉर लोकल पर जोर दिया, उसी दौर में भारतीय भाषाओं की UPSC ने उपेक्षा की। तो क्या आयोग भारत की परंपरागत संवेदनाओं को न समझने के साथ-साथ प्रधानमंत्री के संवेदनशील आग्रहों की भी अनदेखी कर गया?

  • 2013 तक हिंदी की हालत कुछ हद तक ठीक थी। तब टॉप 100 में 8 हिंदी माध्यम के थे।
  • सीसैट के आने के बाद से हिंदी माध्यम के कैंडिडेट्स के लिए समय का पहिया उलटा चलने लगा और 2021 आते-आते हिंदी ध्वस्त हो गई।
  • 2022 का रिजल्ट इस लिहाज से बेहतर रहा, लेकिन यह गुणात्मकता की दृष्टि से नहीं, मात्रात्मक दृष्टि से ही बेहतर है। अधिकांश का रैंक 800 से नीचे है।

सवाल है कि क्या हिंदी और भारतीय भाषाओं के साथ नाइंसाफी हो रही है या इन भाषाओं से तैयारी करने वाले कैंडिडेट्स वैसी योग्यता और क्षमता नहीं रखते, जो अंग्रेजी मीडियम के प्रत्याशियों के पास है? इसमें संदेह नहीं कि UPSC की मानसिकता प्रो-इंग्लिश है। ज्यादा पीछे जाने की जरूरत नहीं। इस साल की प्रारंभिक परीक्षा के द्वितीय प्रश्न पत्र (सीसैट) को देखें तो आयोग की सोच का पता चल जाएगा। लेकिन हिंदी मीडियम के छात्रों के लिए भी सवाल बनते हैं।

  • इनमें ज्यादातर वैसे छात्र होते हैं, जो ग्रामीण परिवेश से एक सपना लेकर आए हैं। लेकिन ये छात्र वह नहीं पढ़ना चाहते, जिसकी अपेक्षा UPSC करता है। वे वही पढ़ते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है। अब आयोग तो आपके स्तर तक आने से रहा और आप ऊपर जाना नहीं चाहते। अगर यही चलता रहा तो रिजल्ट ऐसे ही आएंगे।
  • दूसरी बात यह कि इन छात्रों का मुकाबला केवल अंग्रेजी मीडियम वालों से नहीं होता बल्कि उन लोगों से भी होता है जो मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे क्षेत्रों से आए हैं। इन युवाओं का अप्रोच नॉर्मल ऐकडेमिक वालों से बेहतर होता है। यह बात हिंदी मीडियम का छात्र समझने के लिए तैयार नहीं है।

यह भी ध्यान रखने की बात है कि भारत का लोकतंत्र देश की विविधता के साथ परिपक्व हुआ है। इसलिए सिविल सर्वेंट्स का मनोविज्ञान इसके अनुकूल होना चाहिए। भारत में जब सिविल सेवाओं की शुरुआत हुई तो सिविल सर्वेंट्स को लंदन के हेलिवरी कॉलेज में भारतीय इतिहास और संस्कृति के ज्ञान से परिपूर्ण करने के बाद भारत में नियुक्ति दी जाती थी। अब ऐसा नहीं है। अब प्रत्याशी का मकसद परीक्षा पास करना भर रह गया है। पिछले बरसों में देखा गया है कि लोग पाली, उर्दू या पर्शियन लेकर एग्जाम क्वालिफाई कर लेते हैं। इनकी प्रशासन में क्या उपयोगिता हो सकती है? आयोग को देखना चाहिए कि इन वैकल्पिक विषयों को लेने वालों के रिजल्ट अन्य सब्जेक्ट्स वालों की तुलना में बेहतर क्यों होते हैं।

कौटिल्य ने कहा है कि हमें नागरिक सेवा में चरित्रवान लोग चाहिए। हम योग्यता का निर्माण कर लेंगे। क्या UPSC ऐसा मानकर चल पा रहा है? उसने इसके नाम पर एथिक्स का एक पेपर जोड़ दिया है। क्या यह विषय पढ़ने मात्र से प्रत्याशी अपने अंदर नैतिक मूल्यों का निर्माण कर लेते हैं?

आदर्श परीक्षा पैटर्न

जो भी हो, यह विषय बड़ा है और जटिल भी। इसलिए समय-समय पर एक्सपर्ट्स कमिटियों का गठन भी किया जाता है लेकिन अब तक आयोग परीक्षा का आदर्श पैटर्न बना नहीं पाया है। आयोग को यह समझने की जरूरत है कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था कोई मैकेनिक्स नहीं है, जो संवेदनाओं और सच्चरित्रता के बगैर यांत्रिक रूप से चलती रहे।

(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

 

 
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