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राम हो या रावण... हर पात्र यहां गाकर बोलता है संवाद पहाड़ में रामलीला का इतिहास बहुत प्राचीन है.

 
  • Poonam Bisht
  • 10 Oct 2023
  • 1102
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देहरादूनः "उठो वीर रणवीर सेना सजाओ/ अटल मार रण में मचाओ-मचाओ/ आगे से महावीर जी को पठाकर/ पीछे से कीसों की सेना सजाकर".... उत्तराखंड की रामलीलाओं का यह प्रसिद्ध संवाद जब मंच पर गायक सुनाया जाता है तो दर्शक भी साथ-साथ गाने लगते हैं। असल में पहाड़ी समाज में रामलीलाओं का पुरानी इतिहास रहा है। घर-घर बड़े-बूढ़ों को रामलीलाओं के ये संवाद याद रहते हैं। क्या खासियत होती है इन रामलीलाओं की, आज जानते हैं:

राम से लेकर रावण तक गाकर अदा करते हैं संवाद​

उत्तराखंड के जाने-माने संस्कृतिविद प्रफेसर दाताराम पुरोहित उत्तराखंड की रामलीलाओं की खूबियां बताते हुए कहते हैं, जो एक बात देश के बाकी हिस्सों से इसे अलग करती है इसकी गायिकी का अंदाज। उत्तराखंडी रामलीलाओं में राम से लेकर रावण तक, शूर्पणखा से लेकर शबरी तक को गाकर संवाद करने होते हैं। यही वजह है कि जिन कलाकारों की आवाज अच्छी होती है, अमूमन उन्हें ही चुना जाता है। एक तरह से उत्तराखंडी रामलीलाओं में अभिनय गौण रहता है। दूसरी बात कि इन रामलीलाओं में कलाकारों को बहुत कड़े अनुशासन में रहना होता है। नियमित स्नान, ध्यान, प्याज लहसुन तक का त्याग करना होता है। अल्मोड़ा में तो राम-सीता का किरदार ही 12 - 13 वर्ष के किशोरों से करवाया जाता है। तीसरी बात अहम बात यह है कि इन रामलीलाओं में स्थानीय धुनें बहुत होती हैं। संस्कृत के श्लोक सुनने को मिलते हैं।

1860 में अल्मोड़ा से शुरुआत​

उत्तराखंड में रामलीलाओं के मंचन के इतिहास पर प्रफेसर पुरोहित बताते हैं कि यह सिलसिला सन 1860 में अल्मोड़ा से शुरू हुआ था, जहां भवानीदत्त जोशी और देवीदत्त जोशी ने रामलीला का गायिकी के अंदाज में मंचन किया। वहीं से यह मॉडर्न अंदाज आज गढ़वाल, कुमाऊं में फैला। रामलीला को फैलाने में व्यापारी वर्ग का बहुत अहम रोल रहा। अल्मोड़ा की रामलीला के स्टाइल के अलावा दो और स्टाइल प्रचलित हुए। इनमें श्रीनगर की रामलीला का जिक्र जरूरी है जिसे अंबाशायर ने शुरू किया था। उनकी रामलीला में गायिकी का अंदाज अल्मोड़ा के अंदाज से अलग था। श्री राम राय दरबार देहरादून में भी रामलीला बेसिक स्टाइल में मंचित होती थी। देवप्रयाग में भी रामलीला का अलग अंदाज हुआ करता था मगर अब ज्यादातर जगहों पर अल्मोड़ा वाला स्टाइल ही चलता है।

सरकारी कॉलोनियों में फली-फूलीं रामलीलाएं​

पिछले 30 साल से रामलीला में अभिनय कर रहे जगमोहन सिंह रावत बताते हैं कि बचपन पहाड़ों पर बीता तो वहां की रामलीलाएं देखा करते थे। फिर दिल्ली आ गए तो यहां रामलीलाओं में अभिनय शुरू किया। तब सरकारी कॉलोनियों में खूब रामलीलाएं होती थीं। वहीं से हमने भी शुरू किया। फिर धरोहर संस्था बनाकर रामलीलाएं कीं। अब कई वर्षों से कामधेनु रामलीला समिति के साथ जुड़े हैं और रावण और दशरथ का पात्र करते हैं। उत्तराखंडी रामलीलाओं की क्या विशेषता है, इस बारे में वह बताते हैं कि उत्तराखंडी रामलीलाएं तुलसीदास रचित रामचरितमानस पर आधारित होती हैं। उसी की चौपाइयां ली जाती हैं। बीच-बीच में ठेठ पहाड़ी अंदाज भी झलकता है, जब पहाड़ी गीत पर परफॉर्मेंस, कॉमेडी सीन होते हैं। सिर्फ पहाड़ों की रामलीला में ही आपको शास्त्रीय संगीत का समावेश दिखता है। उत्तराखंड की भीमताली शैली की रामलीला नैनीताल, हलद्वानी में बहुत प्रसिद्ध है। इसका मंचन हर कोई नहीं कर सकता क्योंकि इसमें संवाद पूरी तरह गाकर अदा किए जाते हैं। यह गायन भी पूरी तरह शास्त्रीय संगीत पर आधारित होता है। कामधेनु रामलीला में भी आपको यह शैली देखने को मिलती है।

इस बार दिखेगा नया प्रयोग​

कामधेनु रामलीला समिति के प्रमुख डॉ कुलदीप भंडारी बताते हैं कि मंच के मामले में हो या तकनीक या शैली के मामले में हमारी इस रामलीला की कई विशेषताएं हैं। यह पहली उत्तराखंडी रामलीला है जहां कुमाऊंनी और गढ़वाली दोनों शैली का समावेश है। इस बार तो और भी नया प्रयोग करने जा रहे हैं। 25 अक्टूबर को दशहर के अगले दिन हम गढ़वाली, कुमाऊंनी एवं जौनसारी भाषा अकादमी, दिल्ली सरकार के सहयोग से दिल्ली की तमाम रामलीलाओं की प्रतियोगिता रखने जा रहे हैं। इसमें सभी को 15 मिनट के मंचन का अवसर मिलेगा। इसमें वे अपनी रामलीला का बेस्ट सीन करके दिखाएंगे। इसके लिए आवेदन की अंतिम तिथि 3 अक्टूबर है। जिनका भी मंचन टॉप तीन में चुना जाएगा, उन्हें नकद पुरस्कार दिया जाएगा।

कलाकारों के लिए मौका​

जगमोहन रावत बताते हैं कि इस बार हमारी रामलीला में सीता का पात्र 20-21 साल की युवती कर रही हैं। इसी तरह कई पात्र 16-17 साल के किशोर भी कर रहे हैं। वहीं डॉ कुलदीप भंडारी बताते हैं कि बच्चों को जोड़े रखने के लिए हम हर साल बच्चों से रामलीला के बीच में सवाल पूछते हैं और सही जवाब पर उन्हें पुरस्कार देते हैं। हर रोज 15-20 गिफ्ट तो देते ही हैं। इस बार पुरस्कार में एलईडी टीवी से लेकर वॉशिंग मशीन और फ्रिज तक रखे गए हैं। वहीं पवन कुमार मैठाणी मानते हैं कि युवा कलाकारों के लिए रामलीलाएं अपनी अदाकारी दिखाने का मंच तो हैं मगर ज्यादातर इससे आगे नहीं बढ़ पाते।

दर्शकों को बांधे रखना होगा​

गढ़वाल भ्रातृ मंडल से जुड़े पवन कुमार मैठाणी बताते हैं कि रामलीलाओं में अभिनय करने वाले तो फिर भी हैं मगर दर्शक कम होते जा रहे हैं। इसकी वजह बताते हुए वह कहते हैं, पहले ज्यादातर लोग 9 से 5 की ड्यूटी वाले थे। डिनर के बाद रामलीला देखने आ जाते थे। वहीं अब ज्यादातर युवा मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर रहे हैं जहां दिन-रात की ड्यूटी होती है। इससे दर्शक गण कम मिलते हैं। कुछ अपवाद छोड़ दें तो ज्यादातर उत्तराखंडी रामलीलाएं खुद को कमर्शल नहीं कर पाईं, जिससे आय के साधन सीमित रहे और रामलीला को कौथिग की तरह बड़े आयोजन का रूप नहीं दिया जा सका। आज भी रामलीला समितियों को पर्ची कटवाने के लिए घर-घर ही जाना होता है। वक्त के साथ दिल्ली का विस्तार होता चला गया, और रामलीला करने वाले, उसके दर्शक बिखर गए। पुराने डायरेक्टर आज नहीं रहे, यूथ भी बिजी हो गया। सिक्यॉरिटी से जुड़ी चिंताएं भी हैं, सो अलग। मयूर विहार फेज 3 निवासी राजेंद्र सिंह नेगी बताते हैं, पहाड़ों पर नवरात्र का समय ऐसा होता है जब खेती के काम से सब फारिग हो चुके होते हैं। पहले चूंकि फिल्म आदि मनोरंजन के साधन कम थे, इसलिए हर कोई रामलीला देखने जाता ही था।

​किशनगंज में शुरू हुई रामलीला’​

पवन कुमार मैठाणी बताते हैं, साल 1958 में रेलवे कॉलोनी किसनगंज में उत्तराखंडी रामलीला होती थी। यह सबसे पुरानी ज्ञात रामलीला थी। गढ़वाल कीर्तन मंडल एवं रामलीला समिति इसे करवाती थी। साल 1986 से दिलशाद गार्डन में गढ़वाल भ्रातृ मंडल रामलीला करवा रहा है। यह तब शुरू हुई थी जब यह इलाका बसना ही शुरू हुआ था। तब सरकारी कर्मचारी यहां ज्यादा रहते थे। 2 अक्टूबर रामपुर तिराहा कांड की वजह से साल 1994 ही ऐसा साल रहा जब यहां मंचन नहीं हुआ। गढ़वाल भ्रातृ मंडल ने रामलीलाओं के अलावा नाटक मंचन भी खूब करवाए। इसके अलावा मिंटो रोड, लक्ष्मीबाई नगर, गुलाबी बाग की रामलीलाएं भी खूब प्रसिद्ध रही हैं। ज्यादातर सरकारी कॉलोनी में उत्तराखंडी रामलीलाएं हुईं। चूंकि ये हिंदी भाषा में ही होती हैं, इसलिए सभी समाज के लोग जुड़ते हैं। यह वह दौर था जब परशुराम के डायलॉग बच्चे-बच्चे को रटे होते थे। किदवई नगर की रामलीला को देखने इंदिरा गांधी, गोविंद वल्लभ पंत तक आते थे। कुल मिलाकर, किशनगंज, जय विहार, श्याम विहार, रास विहार, वेस्ट विनोद नगर, दिलशाद गार्डन, गुलाबीबाग, मिंटो रोड, लक्ष्मी बाई नगर की रामलीलाएं प्रसिद्ध उत्तराखंडी रामलीलाओं में शुमार हैं।

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दस दिन की लीला एक दिन में​

मोहन उप्रेती की अगुआई में पर्वतीय कला केंद्र ने सन 1985 में दिल्ली में रामलीला का मंचन शुरू किया। यह केंद्र रामलीला को भीमताली शैली में करता था। इसकी खासियत थी कि 10 दिन की लीला को नाट्य शैली में तीन दिन में ही कर लेते थे। यह इतनी पॉपुलर हुई कि लोग टिकट खरीदकर इसे देखते थे। 2018 से रुद्रवीणा संस्था वाले शिवदत्त पंत ने इसे दोबारा जिंदा किया। उन्होंने भीमताली शैली में नए प्रयोग करते हुए पूरी रामलीला को चार घंटे में समेट दिया।

 

 
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