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क्या आप जानते हैं पीएम मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में शामिल भारत के पहले गांव माणा की खासियत? यहां आने से दूर हो जाती है गरीबी!.

 
  • Dhirender Singh
  • 04 Nov 2023
  • 1214
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देहरादून/चमोली: भारत-चीन सीमा पर बसा देश का पहला गांव माणा विश्व प्रसिद्ध है। भगवान बद्री विशाल के धाम आने वाले श्रद्धालु भारत के प्रथम गांव माणा में घूमने के लिए जरूर आते हैं। सरस्वती नदी के तट पर स्थित माणा गांव बेहद खूबसूरत है। इसकी खूबसूरती के अलावा यहां बनी चाय की दुकान लोगों के लिए मशहूर सेल्फी प्वाइंट है, क्योंकि अब इस दुकान पर भारत की पहली चाय की दुकान का बोर्ड लगा हुआ है।

पीएम नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में उत्तराखंड का पहला गांव चमोली जिले में भारत-चीन सीमा पर बसा हुआ है। सीमांत गांव माणा को पहले भारत का अंतिम गांव कहा जाता था। 21 अक्टूबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीमांत गांव माना को देश का पहले गांव होने का गौरव दिया। इसके बाद अब यहां भारत का पहला गांव होने का साइन बोर्ड दूर से ही चमक जाता है। सीमांत गांव को प्रथम गांव का दर्जा देकर प्रधानमंत्री इस गांव के विकास के लिए अधिकारियों को खास तौर पर निर्देशित किया था।

वाइब्रेंट विलेज योजना में शामिल

प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट के तहत वाइब्रेंट विलेज योजना में यह गांव भी शामिल है। बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने के बाद बर्फबारी बढ़ते ही यहां के लोग चमोली जिले में आ जाते हैं, जिसके बाद छह माह के लिए माणा गांव सूना हो जाता है। धाम के कपाट खुलने से कुछ समय पहले ही यहां के लोग वापस अपने घरों को लौटते हैं। इस 6 माह में यहां पर जबरदस्त बर्फबारी होती है, जिस वजह से यहां किसी का भी रहना बेहद मुश्किल होता है। इस गांव का इंटर कॉलेज पहला कॉलेज है जो साल के 6 महीने माणा में और 6 महीने चमोली में चलाया जाता है।

पौराणिक रहस्य से भरपूर है माणा

यहां स्थानीय लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए पहचाने जाते हैं। इस गांव में रेडंपा जाति के लोग रहते हैं। गांव से अनेक पौराणिक रहस्य जुड़े हुए हैं। यह गांव जहां महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। वहीं भगवान गणेश की भी इस गांव में मान्यता है। इसी गांव से होकर पांडव गए थे। मान्यताओं के अनुसार चारों धामों में भी सबसे पवित्र माणा गांव है और इस गांव को शाप मुक्त और पाप मुक्त भी कहा जाता है। इस गांव से जुड़ी एक सबसे बड़ी मान्यता यह है कि यहां आने वाले व्यक्ति की गरीबी दूर हो जाती है। गांव को भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद मिला हुआ है कि जो भी यहां आएगी वह सुख समृद्धि प्राप्त करेगा।

सांस्कृतिक विरासत भी जानिए

यह गांव पूरे साल भर ठंडा रहता है, लेकिन अप्रैल में में बर्फ पिघलने के बाद यहां की मिट्टी आलू की खेती के लिए सबसे उपयुक्त हो जाती है। जौ और थापर के साथ ही अन्य फसलें भी यहां अच्छी मात्रा में होती हैं। भोजपत्र भी बड़ी संख्या में यहां मिल जाते हैं। तिब्बत सीमा से लगे इस गांव की सांस्कृतिक विरासत भी महत्वपूर्ण है। इस गांव की अनूठी परंपराएं भी लोगों का आकर्षित करती हैं। माना में व्यास गुफा, गणेश गुफा, सरस्वती मंदिर, भीम पुल और वसुधारा काफी प्रसिद्ध है।

जड़ी-बूटियों की भरमार

समुद्र तल से 3200 मीटर की ऊंचाई पर चमोली जिले में स्थित माणा गांव जहां अपनी खूबसूरती के लिए विश्व प्रसिद्ध है। वहीं इसे जड़ी-बूटियों का गांव भी कहा जाता है। यहां मिलने वाली जड़ी-बूटियां कई तरह की बीमारियों में लाभकारी होती हैं। यहां मिलने वाली कुछ उपयोगी जड़ी-बूटियों में ‘बालछड़ी’ है जो बालों में रूसी खत्म करने और उन्हें स्वस्थ रखने के काम आती है। खोया, पीपी की जड़, पाखान जड़ी भी अपने आप में बहुत कारगर है।

ज्यादातर घर दो मंजिल के

माणा गांव की आबादी 400 के करीब है और यहां केवल लगभग 60 घर हैं। ज्यादातर घर दो मंजिलों पर बने हुए हैं और इन्हें बनाने में लकड़ी का ज्यादा प्रयोग हुआ है। छत पत्थर के पटालों की बनी है। इन घरों की खूबी ये है कि इस तरह के मकान भूकंप के झटकों को आसानी से झेल लेते हैं। इन मकानों में ऊपर की मंजिल में घर के लोग रहते हैं जबकि नीचे पशुओं को रखा जाता है।

वेदों का अर्थ भी मिलता है

माणा गांव से लगे कई ऐतिहासिक स्थल हैं। गांव से कुछ ऊपर जा कर गणेश गुफा और व्यास गुफा है। व्यास गुफा के बारे में मान्यता है कि यहीं पर महर्षि वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी और वेदों को चार भागों में बांटा था। व्यास गुफा और गणेश गुफा यहां होने से इस पौराणिक कथा को सिद्ध करते हैं कि महाभारत और पुराणों का लेखन करते समय व्यासजी ने बोला और गणेशजी ने लिखा था। व्यास गुफा में एक शिला पर प्राकृत भाषा में वेदों का अर्थ लिखा गया है।

भीमपुल की खास बातें

व्यास गुफा के पास है भीमपुल। पांडव इसी मार्ग से होते हुए अलकापुरी गए थे। कहा जाता है कि अब भी कुछ लोग इस स्थान को स्वर्ग जाने का रास्ता मानकर चुपके से चले जाते हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ-साथ भीम पुल से एक रोचक लोक मान्यता भी जुड़ी हुई है। जब पांडव इस मार्ग से गुजरे थे। तब वहां दो पहाड़ियों के बीच गहरी खाई थी, जिसे पार करना आसान नहीं था। तब महाबली भीम ने एक भारी-भरकम चट्टान उठाकर फेंकी और खाई को पाटकर पुल बना दिया था। बाद में स्थानीय लोगों ने यहां पर भीम का मंदिर भी बना दिया है।

पाप करने वालों पर नहीं गिरता पानी

यहां से बहने वाली सरस्वती नदी बेशक अब विलुप्त हो चुकी है, लेकिन माणा गांव में आज भी इसके दर्शन हो जाएंगे। यहां गांव के आखरी छोर पर चट्टानों के बीच से एक झरना गिरता हुआ दिखाई देता है। इसका पानी धरती में कहां समा जाता है इसका पता नहीं चलता। कहा जाता है कि इसका पानी कुछ दूर जाते ही अलकनंदा नदी में मिलता है। कहा जाता है कि जब पांडव इस गांव से होते हुए स्वर्ग जा रहे थे तो उन्होंने यहां से सरस्वती नदी से रास्ता मांगा था, लेकिन सरस्वती ने उन्हें रास्ता नहीं दिया। इसके बाद महाबली भीम ने दो बड़ी-बड़ी चट्टानों को उठाकर नदी के ऊपर रखकर अपने लिए रास्ता बनाया था। वसुधारा में पानी 400 फीट ऊंचाई से गिरता हुआ बेहद मोहक लगता है। इस झरने को लेकर मान्यता है कि झरने का पानी पापियों को नहीं भिगाता है।

 

 
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