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अंबेडकर के नाम पर होती है आरक्षण की राजनीति, लेकिन मंडल फॉर्मूला बिल्कुल उलट!.

 
  • Kunal Kataria
  • 28 Oct 2023
  • 1208
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बिहार जाति सर्वेक्षण हमें एक बार फिर यह स्पष्ट करने का अवसर देता है कि 'आरक्षण' क्या है और क्या नहीं है। विशेष रूप से, 'आरक्षण' की अवधारणा को उसके समानार्थी शब्दों 'प्रतिनिधित्व' और 'कोटा' से अलग रखना आवश्यक है। वे अक्सर पर्यायवाची के रूप में प्रकट होते हैं, और यहां तक कि तीन जुड़वां (ट्रिपलेट्स) भी कहा जाता है, लेकिन ऐसा कोई संबंध नहीं है। वे जन्म के समय ही अलग हो गए थे। अंबेडकर ने आरक्षण की जो अवधारणा दी, वह सकारात्मक भेदभाव का एक आदर्श उदाहरण था। पहली बात तो यह कि वह बहुमत के लिए नहीं था, बल्कि ऐतिहासिक रूप से सताए गए अल्पसंख्यक यानी अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सेवा के लिए थे। दूसरा, यह सीमित अवधि के लिए विस्तार योग्य था, लेकिन जांच के बाद। तीसरा, यह एक गरीबी-विरोधी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एससी और एसटी के मानसिक रूप से सबल लोगों का एक महत्वपूर्ण समूह तैयार करने के लिए बनाया गया था ताकि वो खुद अपनी लड़ाई लड़ सकें।

यह कुछ हद तक कीमोथेरेपी के समान है जहां दवाएं प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को कैंसर से लड़ने का बेहतर मौका देती हैं, क्योंकि शरीर असली नायक होता है। साथ ही, अंबेडकर के आरक्षणों की सटीकता को ध्यान में रखते हुए, एससी और एसटी को केवल उनके ऐतिहासिक पिछड़ेपन से पहचाना गया था लेकिन उनकी आमदनी और संपत्ति बढ़ाने के लिए कोई भत्ता नहीं दिया गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि आरक्षण कुछ चुनिंदा लोगों पर लागू होता है जबकि गरीबी विरोधी कार्यक्रमों का व्यापक कवरेज होता है।

जब भारत ने मंडल की सिफारिशों को स्वीकार किया तो सरकार आरक्षण की तरफ नहीं बल्कि कोटा की ओर झुक रही थी। मंडल मंत्र में अंबेडकर की नकल करने की कोशिश की गई, लेकिन दो प्रमुख कारणों से यह प्रयास सतही साबित हुआ। पहला, यह विशेष रूप से बहुसंख्यक आबादी, ओबीसी के लिए तैयार किया गया था, और दूसरा, यह जल्द ही आर्थिक विचारों के सामने झुक गया। इस पहलू को 1992 के इंद्रा साहनी फैसले में उजागर किया गया था जिसमें तथाकथित 'क्रीमी लेयर' पर विशेष ध्यान दिया गया था।

इस मामले के अदालत में जाने का कारण यह था कि मंडल की नीति में एक चुनिंदा समूह की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने की क्षमता थी, न कि ऐतिहासिक गलतियों से लड़ने की। अर्थशास्त्र ने ओबीसी श्रेणी में गुप्त प्रवेश किया क्योंकि इस समुदाय को कभी भी एससी की तरह पारंपरिक अन्याय का सामना नहीं करना पड़ा। एक नियम के रूप में, एससी के विपरीत, ओबीसी को कभी भी मंदिरों में प्रवेश करने या गांव के कुओं से पानी लेने से नहीं रोका गया।

आय और संपत्ति अब बिहार जाति सर्वेक्षण के साथ पूरी तरह से दिखाई देती है, जो आर्थिक आधार पर ओबीसी को अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) से पूरी तरह अलग करती है। इस प्रकार, जबकि अंबेडकर के लिए आरक्षण एक सामाजिक बीमारी से लड़ने की एक दवा थी और इसका अधिक मात्रा में उपयोग हानिकारक हो सकता है, इसके विपरीत मंडल ने ओबीसी के मद्देनजर उपचार को मैंटनेंस डाइट का रूप दे दिया जो लंबा चलता है। इसलिए 'कोटा' शब्द मंडल फॉर्मूले पर सबसे अच्छा लागू होता है।

जातिगत असमानताएं वास्तव में मौजूद हैं और बिहार सर्वेक्षण में यह साफ झलकता भी है। लेकिन क्या यह वास्तव में एक यूरेका मोमेंट है या फिर वाहियात से कवायद? जातियों के बीच आर्थिक स्थिति में इस तरह के अंतर सर्वविदित हैं। अनुमान के मुताबिक, लगभग 9,500 ओबीसी को मंडल कोटा से कोई लाभ नहीं मिला है। हालांकि, यह असमानता जाति उत्पीड़न के कारण नहीं है, बल्कि गरीबी नामक बीमारी के कारण है।
 

यदि उत्तर प्रदेश में जाति सर्वेक्षण किया जाता है, तो राजभरों की स्थिति क्या है, इसको लेकर उत्सुकता रहेगी, जिन्हें जातीय संघर्ष से निकली मलाई खाने का कभी मौका नहीं मिला। अब वो एससी का दर्जा मांग रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनमें से कई का मानना है कि इस तरह के कदम से नौकरी मिलने की संभावना बढ़ेगी। फिर कुम्हार, प्रजापति और लोहार भी यही विशेषाधिकार मांग सकते हैं और अन्य ओबीसी समुदायों की झड़ी लग जाएगी। अगर ऐसा होता है तो यह पहले से ही निर्धारित एससी पर अधिक दबाव डालेगा। यह सांस्कृतिक अपमान को जल्द ही आर्थिक प्रतिस्पर्धा से बदल देगा क्योंकि यह छूआछूत के डंक को जनता की नजरों से हटा सकता है। इसलिए अंबेडकर के आरक्षण और मंडल के कोटा में व्यापक रूप से असमान नीति निर्माण हैं और उन्हें एक ही गर्भनाल से जोड़ने की मंशा पर सीधा प्रहार होगा।

अंत में, सार्वजनिक नीति में प्रतिनिधित्व की भी बातें होती हैं। उदाहरण के तौर पर निर्वाचित निकायों, न्यायिक पीठों, या पुलिस बल में एक तिहाई पद विशेष रूप से महिलाओं के लिए रखे जाते हैं। इस प्रावधान को आरक्षण या कोटा के साथ घालमेल नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इसका उद्देश्य सार्वजनिक संस्थानों की प्रभावकारिता को बढ़ाना है ना कि एक वर्ग को लाभ देना, चाहे वह एससी-एसटी या ओबीसी, कोई भी हो। चूंकि इस तरह के प्रतिनिधित्व से समाज और सामाजिक कल्याण के केंद्रीय संस्थानों को लाभ होता है, इसलिए यह चलन स्थायी बनाना होगा। यदि बड़ी संख्या में महिलाएं कुछ महत्वपूर्ण सार्वजनिक पदों का प्रतिनिधित्व करती हैं, तो उनकी उपस्थिति से सभी को लाभ होता है। वास्तव में, इस तरह के प्रतिनिधित्व भी लोकतंत्रीकरण में योगदान करते हैं और जन जागरूकता बढ़ाते हैं। यही कारण है कि प्रतिनिधित्व एक पूरी तरह से नीति है, जो समय के साथ बेहतर होती जाती है।

क्या बिहार जाति सर्वेक्षण के मद्देनजर इन विचारों को कभी कोई महत्व दिया जाएगा? अभी शुरुआती दिन हैं, लेकिन कौन जानता है? निस्संदेह, बिहार में जाति की गणना मुख्य रूप से आरक्षित सीटों पर 50% की सीमा को तोड़ने के लिए पर्याप्त गोला-बारूद खोजने के लिए थी जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य किया है। अब जब उस राज्य में लगभग 63% को ओबीसी के रूप में नामित किया गया है, तो अकेले उनके लिए कोटा इस सीमा को छू सकता है। सुप्रीम कोर्ट इस पर कैसे प्रतिक्रिया देगा, यह अभी देखा जाना बाकी है। हर हाल में गरीबी विरोधी अभियानों के बिना, मामूली मतभेदों को लेकर बड़ी-बड़ी बहसें होंगी क्योंकि बिहार में भास्कर और जादुपतीय जैसी कई ऐसी छोटी जातियां हैं जिनकी आबादी केवल 100 के आसपास है। जैसे-जैसे सरकार कल्याणकारी योजनाओं का वसीयतनाम पढ़ेगी, भाई-भाई के खिलाफ होते जाएंगे।
 

 

 
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