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क्या राज्यपाल पारित विधेयक को रोक सकते हैं? राज्यपाल के अधिकार को लेकर क्यों है हंगामा?.

 
  • Rajesh Choudhary
  • 27 Nov 2023
  • 1047
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नई दिल्ली : राज्यों के विधानसभा से पास बिल को रोकने का राज्यपाल को कितना अधिकार है? यह अहम सवाल उठ खड़ा हुआ है। हाल में सुप्रीम कोर्ट के सामने तीन राज्यों के मामले आए हैं। उन मामलों की सुनवाई हुई है। पंजाब के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला भी दिया है। तमिलनाडु, केरल और पंजाब की सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग अर्जी दाखिल कर अपने-अपने गवर्नरों पर आरोप लगाया है कि सदन से बिल पास होने के बावजूद गवर्नर उस पर फैसला नहीं ले रहे हैं और उसे मंजूरी नहीं दे रहे हैं। चुनी हुई सरकार के क्या अधिकार हैं और गवर्नर को बिल रोकने का कितना अधिकार है इसका परीक्षण हो रहा है।

क्या है विवाद

सुप्रीम कोर्ट के सामने पंजाब का मामला छह नवंबर को आया था। पंजाब सरकार की ओर से पेश अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा था कि कई महत्वपूर्ण बिल गवर्नर के पास भेजा गया है, लेकिन अब तक कोई एक्शन नहीं हुआ है। इस कारण सरकार चलाने में परेशानी हो रही है। गवर्नर ने अनियमितता की बात कह कर बिल पर विचार को टाल दिया है।

तमिलनाडु सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि विधानसभा से पास बिल को राज्यपाल मंजूरी देने में देरी कर रहे हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है। उसने अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल से कहा था कि वह मामले में कोर्ट को सहयोग करें। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीर करार दिया। केरल सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि राज्यपाल ने विधानसभा से पारित आठ बिलों पर कोई कार्रवाई नहीं की है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के फैसले में कहा है कि गवर्नर अनंत काल के लिए विधेयक को बिना किसी कार्रवाई के पेंडिंग नहीं रख सकते। गवर्नर बिना चुने हुए राज्य प्रमुख के तौर पर होते हैं, जिन्हें संवैधानिक शक्ति मिली हुई है। वह अपनी शक्ति का राज्य विधानसभाओं की कानून बनाने की सामान्य प्रक्रिया को नाकाम करने के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते।

-सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी में कहा था कि संसदीय लोकतंत्र में शक्ति चुने हुए प्रतिनिधि के पास है। गवर्नर विधानसभा सेशन पर संदेह नहीं कर सकते हैं। कोर्ट ने पंजाब के गवर्नर से कहा कि वह पेंडिंग विधेयक पर विचार कर फैसला करें।

-सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ की अगुआई वाली बेंच ने कहा था कि गवर्नर के लिए यह विकल्प नहीं है कि वह विधानसभा सेशन पर संदेह जताकर बिल की मंजूरी को रोक दे। गवर्नर आग से खेल रहे हैं।

-सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के गवर्नर बनवारी लाल पुरोहित से कहा था कि उनके पास जो चार बिल हैं उसे वह निश्चित तौर पर विचार कर फैसला लें। पंजाब के गवर्नर ने विधानसभा सेशन पर संहेद जताया था जिसमें विधेयक पास हुआ था और बिल को पेंडिंग रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधानसभा सेशन पर किसी तरह से संदेह जताना लोकतंत्र के लिए खतरे वाली बात है। स्पीकर को विधानसभा का गार्जियन माना गया है।

-सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि स्पीकर को अधिकार है कि वह सदन की बैठक स्थगित कर दें, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल कर सदन को स्थायी तौर पर सस्पेंड नहीं रखा जा सकता है। यह बेहद गंभीर मसला है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी सवाल किया है कि अगर इस तरह का अधिकार गवर्नर को दिया गया तो क्या होगा। अगर ऐसा अधिकार गवर्नर के पास रहा तो क्या संसदीय लोकतंत्र जारी रह सकता है।

गवर्नर बिल रोक नहीं सकते : एक्सपर्ट्स

लोकसभा के पूर्व सेक्रेट्री जनरल पीटीडी अचारी कहते हैं कि संविधान में चुनी हुई सरकार को सारे अधिकार दिए गए हैं। राज्य की चुनी हुई सरकार के पास इग्जेक्युटिव अधिकार हैं। मंत्रिपरिषद की सलाह से ही गवर्नर को काम करना होता है। अगर कोई बिल सदन से पास होता है और उसे मंजूरी के लिए गवर्नर के पास भेजा जाता है तो गवर्नर के पास सीमित ऑप्शन होते हैं। वह उसे मंजूरी दे सकते हैं या दोबारा विधानसभा को विचार के लिए कह सकते हैं या वह राष्ट्रपति के पास उसे भेज सकते हैं। वह किसी बिल को अपने पास पेंडिंग नहीं रख सकते हैं। गवर्नर को संविधान के तहत काम करना होता है और संविधान में चुनी हुई सरकार को सारे अधिकार मिले हुए हैं। जब सरकार अल्पमत में हो या मिलीजुली सरकार बनाने का मसला हो तो गवर्नर अपने विवेक का इस्तेमाल कर फैसला लेते हैं, लेकिन कोई चुनी हुई सरकार अगर बहुमत में है तो उसके सलाह पर ही काम करना होता है। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट केटीएस तुलसी कहते हैं कि संसदीय लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को अधिकार दिए गए हैं। अगर सदन से कोई बिल पास होता है तो उस पर गवर्नर को मुहर लगानी होती है। गवर्नर राज्य के प्रधान होते हैं लेकिन उन्हें मंत्रिपरिषद के सलाह पर काम करना होता है। वह खुद से फैसला नहीं ले सकते हैं।

 

 
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