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मजबूरी या कुछ और... मालदीव भारतीय सैनिकों को क्यों निकालना चाहता है?.

 
  • Alpyu Singh
  • 27 Nov 2023
  • 758
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नई दिल्ली : पिछले साल अप्रैल में मालदीव की राजधानी माले में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के घर के बाहर एक विशालकाय बैनर लगा था। इस पर लिखा था- इंडिया आउट। भारतीय सैनिकों के खिलाफ इस अभियान को पिछले साल मालदीव की आबोहवा में महसूस किया जा सकता था। अब मालदीव में राष्ट्रपति की कुर्सी हासिल करने वाले मोहम्मद मुइज्जू कह रहे हैं कि वह भारतीय सैनिकों को मालदीव से बाहर करके रहेंगे। इससे नारे की राजनीति को समझा जा सकता है। पिछले साल इंडिया आउट अभियान जोरों पर था। उस वक्त मुइज्जू माले के मेयर थे। आखिर, मालदीव क्यों भारतीय सैनिकों को बाहर निकालना चाहता है?

जीत थी चौंकानेवाली : साल 2021 में मुइज्जू विपक्ष की ओर से मेयर बने थे। यह जीत चौंकाने वाली थी, क्योंकि माले को पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी का गढ़ माना जाता था। पिछले साल जून में जब माले में भारतीय उच्चायोग की ओर से किए गए एक योग कैंप पर प्रदर्शनकारियों ने धावा बोला था, उसी वक्त समझ आ गया था कि माले की हवा बदल गई है।

राष्ट्रपति सोलिह की सरकार ने भारत विरोधी कैंपेन पर रोक लगाई थी। उसने भारत को मालदीव का भरोसेमंद पड़ोसी बताया था। हालांकि तब से अब तक मालदीव के तटों के नीले पानी में काफी रंग देखे गए हैं, जिनमें चुनाव का रंग सतह पर दिखा।

इंडिया फर्स्ट पर पड़ा भारी : समुद्र के तटों, चट्टानों और समुद्री जीवन के लिए मशहूर 1200 द्वीपों वाले सुंदर देश के चुनाव दरअसल दो नारों के बीच थे- इंडिया फर्स्ट और इंडिया आउट। सितंबर में हुए चुनावों में जनता ने मुइज्जू को बहुमत से जिताया। उन्होंने अपने चुनावी प्रचार में कहा था कि वह मालदीव में मौजूद भारतीय सैनिकों को देश से बाहर करेंगे।

हालांकि, मोइज्जू यह भी कह रहे हैं कि भारतीय सैनिकों की जगह मालदीव में चीनी सैनिकों को जगह नहीं दी जाएगी। मीडिया के साथ एक बातचीत में उन्होंने कहा कि वह चीन और भारत दोनों के साथ ही बेहतर रिश्ते चाहते हैं। वह मालदीव को जियोपॉलिटिकल प्रतिद्वंद्विता में फंसाना नहीं चाहते।

यामीन के करीबी : मोइज्जू चाहे जो कहें, लेकिन एक सच ये भी है कि साल भर वह ये बात खुद कह चुके हैं कि अगर साल 2023 में उनकी सरकार बनी तो वह चीन के साथ रिश्ते मजबूत करेंगे। मुइज्जू पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के करीबी माने जाते हैं। इस साल हुए चुनावों में यामीन खुद लड़ना चाहते थे, लेकिन पिछले साल दिसंबर में उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में 11 साल की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव की अगुआई वाले गठबंधन ने मुइज्जू को उम्मीदवार खड़ा किया।

मुइज्जू को यामीन का प्रॉक्सी माना जाने लगा है। 2013 से 2018 तक मालदीव के राष्ट्रपति रहे यामीन की सरकार को चीन के साथ नजदीकी के लिए जाना जाता है। इसी दौरान मालदीव बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा बना।

कैसे दी गई आग को हवा? : यामीन के बाद राष्ट्रपति बने इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने इंडिया फर्स्ट की नीति अपनाकर यामीन के किए पर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की। दोनों देश करीब आए और भारत ने मालदीव में अच्छा निवेश किया। विवाद की जड़ में वे दो हेलिकॉप्टर और एक डोनियर एयरक्राफ्ट हैं, जिसके ऑपरेशन और रखरखाव के लिए 70 से ज्यादा भारतीय सैनिक मालदीव में हैं। ये हेलिकॉप्टर मेडिकल इमरजेंसी, रेस्क्यू और समुद्री पट्रोलिंग के लिए काम आते हैं।

भारत और चीन अहम क्यों? : भारत और मालदीव के दशकों पुराने रिश्ते रहे हैं। भारत के लक्षद्वीप से मालदीव महज 700 किमी दूर है और ऐसे में चीन की बढ़ती भूमिका भारत की नींदें उड़ाने के लिए काफी है। माना जाता है कि मालदीव पर चीन का करीब एक बिलियन डॉलर का कर्ज है और ऐसा उसने वहां इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं में पैसे लगाकर किया है।

दूसरी ओर, मालदीव में भारत की मौजूदगी हिंद महासागर में निगरानी के लिए जरूरी है। अब मुइज्जू तेवर दिखा रहे हैं। हालांकि, जानकार कहते हैं कि ये सही है कि फिलहाल मोइज्जू चीन के करीबी होने का अहसास दिला सकते हैं, लेकिन भारत की ओर से किए निवेश को नजरअंदाज नहीं कर सकते। मुइज्जू को आगे चीन और भारत के बीच बैलेंसिंग एक्ट की गुंजाइश तलाशने की कोशिश करनी होगी।

 

 
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