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  • वीपी सिंह :सामाजिक न्याय का वो नेता जो अपने ही लोगों के बीच बन गया खलनायक

वीपी सिंह :सामाजिक न्याय का वो नेता जो अपने ही लोगों के बीच बन गया खलनायक.

 
  • Anil kumar
  • 27 Nov 2023
  • 705
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नई दिल्ली : 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है' से उनके राजनीतिक जीवन में अहम शुरुआत हुई थी। जब उनका राजनीतिक करियर अवसान पर था तब तक यह नारा बदल कर 'राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है', बन चुका था। अंतर्विरोधों वाले राजनीतिक जीवन में वीपी सिंह को सामाजिक न्याय के साथ ही सिद्धांतों की राजनीति करने वाले नेताओं में प्रमुखता से रखा जाता है। वीपी सिंह की आज पुण्यतिथि है। देश में जातिगत जनगणना को लेकर विपक्ष जब सरकार के खिलाफ हमलावर है और अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में इसे अहम मुद्दा बनाना चाहता है। बिहार में जातिगत जनगणना के बाद आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने की बात के आलोक में वीपी सिंह एक बार फिर चर्चा में हैं। बिहार सरकार के कदम को मंडल 2.0 कहा जा रहा है। राजनीति में मिस्टर क्लीन की छवि रखने वाले वीपी सिंह का करियर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा।

पीएम के रूप में ऐतिहासिक फैसला

प्रधानमंत्री के रूप में मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करना वीपी सिंह के करियर का ऐतिहासिक फैसला रहा। इस फैसले के जरिये उन्होंने सामाजिक न्याय को एक अलग रूप में परिभाषित किया। हालांकि, अपने इस फैसले से वह कांग्रेस के साथ ही बीजेपी के सवर्ण नेता उनसे बुरी तरह से नाराज हो गए। देशभर में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के विरोध में आंदोलन हुए। अपने एक फैसले से वीपी सिंह की छवि खलनायक की बन गई थी। इस फैसले से सरकारी नौकरी में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण की राह खुल गई थी। इस फैसले से वे ओबीसी में हीरो बन गए थे। हालांकि, वीपी सिंह कभी भी ओबीसी वर्ग के नेता नहीं बन पाए। हालांकि, उनके विरोधियों का कहना था कि उन्होंने राजनीतिक फायदे के लिए मंडल समिति की सिफारिशों को लागू किया था।

सामाजिक न्याय के पक्षधर थे वीपी

वीपी सिंह सामाजिक न्याय के पक्षधर थे। संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर की तरह ही वीपी सिंह भी सामाजिक न्याय के मामले में सकारात्मक कदम उठाए जाने के पैरोकार थे। प्रधानमंत्री के रूप में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में दिए गए एक भाषण में उन्होंने इस बात का जिक्र भी किया था। संसद के सेंट्रल हॉल में अंबेडकर की तस्वीर लगाने से लेकर उन्हें भारत रत्न से सम्मानित करने का फैसला भी वीपी सिंह के कार्यकाल में ही हुआ था।

महज 11 महीने रहे पीएम

वी.पी. सिंह (25 जून 1931 - 27 नवंबर 2008) का भारतीय राजनीति में एक लंबा, शानदार करियर रहा। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी के पीएम बनने के बीच 1989 में वीपी सिंह देश के आठवे पीएम चुने गए। वीपी सिंह के राजनीतिक जीवन की शुरुआत इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के उपाध्यक्ष के रूप में हुई। वी.पी. सिंह ने कई भूमिकाएं निभाईं। वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री, वित्त मंत्री, राज्यसभा सांसद, तीन निर्वाचन क्षेत्रों से लोकसभा सांसद रहे।

भूदान आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी

राजा बहादुर राम गोपाल सिंह के पुत्र वी.पी. सिंह का जन्म 25 जून 1931 को इलाहाबाद में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद एवं पूना विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। 25 जून 1955 को श्रीमती सीता कुमारी से उनका विवाह हुआ एवं उनके दो बेटे हैं। वी.पी. सिंह इलाहाबाद के कोरॉव में स्थित गोपाल विद्यालय इंटर कालेज के संस्थापक थे। वे 1947-48 में वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज में छात्र संघ के अध्यक्ष थे एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष भी रहे। उन्होंने 1957 में भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया एवं इलाहाबाद जिले के पासना गांव में सुस्थित खेत को दान में दिया था।

 

 
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