जोशीमठ/देहरादून: भगवान बद्री विशाल के कपाट बंद होने की प्रक्रिया अपने आप में महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ कई धार्मिक और पौराणिक रीति-रिवाजों से घिरी हुई है। नारायण के कपाट बंद होने से पहले विष्णु स्वरूप भगवान बद्री विशाल के बड़े भाई और नारायण के चल विग्रह उद्धव जी को भगवान बद्री विशाल के गर्भगृह से बाहर लाया जाता है।
भगवान नारायण के चल विग्रह उद्धव जी को गर्भगृह से बाहर लाने के पीछे का कारण यह है कि उद्धव भगवान बद्री विशाल के बड़े भाई होने के नाते मां लक्ष्मी के जेठ हैं। अगले 6 माह तक नारायण के बामांग में माता लक्ष्मी विराजमान रहेंगी। भगवान बद्री विशाल के कपाट बंद होने से पहले मंदिर के मुख्य पुजारी रावल स्त्री वेश धारण कर मां लक्ष्मी को नारायण के बामांग में विराजमान करेंगे और भगवान बद्री विशाल के चल विग्रह उद्धव 6 माह के लिए पांडुकेश्वर स्थित योग ध्यान बद्री मंदिर में विराजमान रहेंगे।
मान्यता है कि माता लक्ष्मी को भगवान बद्री विशाल के गर्भगृह में विराजमान करने के बाद मंदिर के मुख्य पुजारी रावल भावुक हो जाते हैं, इसलिए उन्हें मंदिर से बाहर तक उल्टे पैर ही लाया जाता है। मंदिर से बाहर आने के बाद भी रावल काफी समय तक गुमसुम रहते हैं। कपाट बंद होने के दौरान भगवान बद्री विशाल को माणा गांव की कुंवारी कन्याओं द्वारा निर्मित घृत कंबल ओढ़ाकर कपाट बंद किए जाते हैं। यह कंबल गाय के घी और कच्चे सूत से निर्मित होता है।
कपाट बंद होने के दौरान जिस अखंड दीपक को मंदिर के गर्भगृह में जलता हुआ छोड़ जाता है, वह दीपक 6 माह बाद कपाट खुलने के अवसर पर जलता हुआ मिलता है। मान्यता है कि 6 माह भगवान बद्री विशाल की पूजा देव ऋषि नारद करते हैं, क्योंकि भगवान बद्री विशाल की पूजा का अधिकार 6 माह नर और छह माह नारायण को है।

भगवान बद्री विशाल के कपाट बंद होने के बाद नारायण के चल विग्रह उद्धव अपने वाहन गरुड़ जी पर सवार होकर पांडुकेश्वर स्थित योग ध्यान मंदिर तक आते हैं, जबकि शंकराचार्य की पवित्र गद्दी और मुख्य पुजारी रावल जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर आते हैं। 6 माह तक शंकराचार्य की पवित्र गद्दी जोशीमठ में ही पूजित होती है।
जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर पहुंचने पर बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी रावल जी के स्वर्ण दंड एवं पगड़ी सुरक्षित कर दी जाती है। इसके बाद जब फिर भगवान बद्री विशाल के कपाट खुलने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है, तब रावल जी को यह स्वर्ण दंड और पगड़ी नरसिंह मंदिर से ही प्रदान की जाती है। नरसिंह मंदिर पहुंचकर बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रावल नरसिंह मंदिर और दुर्गा मंदिर में भोग लगने वाले अन्य चीजों का निरीक्षण करते हैं। इसके साथ ही मंदिर के पुजारी और हक हकूक धारी से इस भोग में किसी प्रकार की कमी न आने का वचन लेते हैं।
