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  • केरल में फैल रहे JN.1 पर टेंशन क्यों नहीं हो रही? WHO ने बताया कहां कमजोर पड़ेगा कोरोना का नया वेरिएंट?

केरल में फैल रहे JN.1 पर टेंशन क्यों नहीं हो रही? WHO ने बताया कहां कमजोर पड़ेगा कोरोना का नया वेरिएंट?.

 
  • Utkarsh Geharwar
  • 19 Dec 2023
  • 973
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नई दिल्ली: कोरोना फिर भारत में दस्तक देने की तैयारी में है। इस बार अलग रूप में। शायद इसलिए हम इसे बहरुपिया कहते हैं। इस बार कोविड का नया वैरिएंट JN.1 का पता चला है। भारत में शुरुआत केरल से हुई है। वैसे तो कोराना का यह नया वैरिएंट अमेरिका में सबसे पहले पाया गया था। खतरे की आगहट को देखते हुए केंद्र सरकार भी अलर्ट हो गई है। सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सतर्क रहने को कहा है। सरकार ने राज्यों से कहा है कि वो फ्लू जैसे लक्षणों वाले मामलों की निगरानी करें, ज्यादा से ज्यादा टेस्ट करवाएं और सभी पॉजिटिव सैंपल को जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए भेजें। केरल के पड़ोसी राज्य कर्नाटक ने भी बुजुर्गों से मास्क पहनने की अपील की है।

देश में कहां-कहां पहुंचा यह नया वैरिएंट?

भारत में केरल के अलावा इस वैरिएंट को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में सिंगापुर से आए एक यात्री के सैंपल में भी पाया गया है। अधिकारियों के मुताबिक गोवा में भी सैंपल में JN.1 के 15 मामले पाए गए हैं। JN.1 ओमिक्रॉन सब-वैरिएंट BA.2.75 का उप-संस्करण है। हालांकि अभी ये पता नहीं चल पाया है कि ये कितना खतरनाक है, संक्रमण कितनी तेजी से फैलाता है या टीका के कितना प्रभावी है। इसीलिए सरकार जीनोम सीक्वेंसिंग करवाकर इसके बारे में ज्यादा जानकारी जुटा रही है।

इस वैरिएंट के बारे में कितना जानते हैं?

जेएन.1 नाम का ये वैरिएंट दरअसल पिरोला (BA.2.86) का ही एक छोटा वंशज है, नया बिल्कुल नहीं है। इसका पहला मामला इस साल सितंबर में अमेरिका में मिला था और दुनिया में इसका पहला मामला जनवरी में ही पाया गया था। ये जेएन.1 वायरस पिरोला से सिर्फ एक ही म्यूटेशन ज्यादा लिए हुए है, मगर वैज्ञानिक इसे ध्यान से देख रहे हैं। क्योंकि पिरोला में स्पाइक प्रोटीन पर 30 से ज्यादा म्यूटेशन हैं। ये स्पाइक प्रोटीन SARS-CoV-2 वायरस का वो हिस्सा है जो इंसान के शरीर के सेल की चाबी से चिपककर अंदर जा सकता है। इसीलिए इस पर ज्यादा म्यूटेशन चिंता का कारण हैं।

जेएन.1 से केस बढ़ सकते हैं या ज्यादा गंभीर लक्षण हो सकते हैं?

फिलहाल किसी सबूत से ऐसा नहीं लगता कि जेएन.1 पहले से फैल रहे वैरिएंट्स से ज्यादा गंभीर लक्षण दे सकता है या ज्यादा तेजी से फैल सकता है। पहले तो ये चिंता थी कि पिरोला के ज्‍यादा म्यूटेशन के कारण यह वैरिएंट टीका और पिछली संक्रमण से बची हुई रोगप्रतिरोधक क्षमता को आसानी से धोखा दे देगा और तेजी से फैलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। असल में, WHO के वैज्ञानिकों ने ये पाया कि पिरोला और जेएन.1 दोनों ही उन लोगों के खून में आसानी से मर जाते हैं जिन्होंने कोरोना का टीका लिया है या फिर पहले किसी वायरस से संक्रमित हो चुके हैं। मतलब टीका और पहले का संक्रमण इन वैरिएंट्स से हमें बचा लेता है। ये वैरिएंट अभी ज्यादा गंभीर बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने का कारण नहीं बन रहे हैं, न ही वो टीके को पूरी तरह से बेअसर कर पा रहे हैं।

जेएन.1 के मामले बढ़ने से क्यों है चिंता?

पिरोला और उसके नजदीकी जेएन.1 के केस दुनियाभर में बढ़ रहे हैं, यही सबसे बड़ी चिंता का कारण है। ये मामले अमेरिका, कुछ यूरोपीय देशों, सिंगापुर और चीन में पाए गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनिया में अब तक अपलोड किए गए कोरोना वायरस सिक्वेंस में से 17% पिरोला और उसके वंशजों के हैं। दिसंबर के शुरुआत तक, इनमें से आधे से ज्यादा सिक्वेंस जेएन.1 के थे। अमेरिका में भी जेएन.1 मौजूदा कोरोना वैरिएंट्स का 15% से 29% हिस्सा बनाता है।

सिंगापुर में जरूर टेंशन

सिंगापुर में 4 से 10 दिसंबर के हफ्ते में अनुमानित 56,043 कोरोना मामले दर्ज किए गए हैं। अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या में भी वृद्धि देखी गई, जिनमें ज्यादातर 60 साल से अधिक उम्र के लोग थे। सिंगापुर के स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा, 'बीए.2.86 के एक उप-वंश जेएन.1 से संक्रमित मामले वर्तमान में सिंगापुर में कोविड-19 मामलों के अधिक मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय डेटा के आधार पर, वर्तमान में कोई स्पष्ट संकेत नहीं है कि बीए.2.86 या जेएन.1 अन्य परिसंचारी वेरिएंट की तुलना में अधिक संक्रामक हैं या अधिक गंभीर बीमारी का कारण बनते हैं।'

क्या भारत में जरूरी है कोरोना का बूस्टर डोज?

सिंगापुर के आंकड़े बताते हैं कि जिन लोगों को आखिरी कोरोना वैक्सीन की खुराक एक साल से ज्यादा पहले लगी थी, उनके अस्पताल में भर्ती होने की संभावना 1.6 गुना ज्यादा थी। हालांकि, भारत में विशेषज्ञों का कहना है कि यहां व्यापक टीकाकरण और बाद में हुए बिना लक्षण वाले संक्रमणों की वजह से संभवत: अच्छी सुरक्षा विकसित हो चुकी है। अशोका यूनिवर्सिटी के ट्रिवेदी स्कूल ऑफ़ बायोसाइंसेस में बायोसाइंसेज़ और हेल्थ रिसर्च के डीन और WHO के सार्स-सीओवी-2 वायरस इवोल्यूशन पर तकनीकी सलाहकार समूह के सदस्य डॉ अनुराग अग्रवाल ने कहा, 'ज्यादातर भारतीयों को कोविड-19 से कम से कम दो, या शायद तीन बार भी सामना हुआ है और उन्होंने कम से कम वैक्सीन की दो खुराक भी ली हैं। आबादी में प्रतिरोधक क्षमता के अच्छे स्तर के साथ - जो गंभीर बीमारी को रोक सकता है - भारत में वास्तव में टीकों की जरूरत नहीं है।
 

 

 
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