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  • वो राजा जिनकी कुंडली ग्रहों को देखकर तय होती है 'बद्रीनाथ धाम' के कपाट खुलने की तारीख 12 मई जुड़ी खास बात

वो राजा जिनकी कुंडली ग्रहों को देखकर तय होती है 'बद्रीनाथ धाम' के कपाट खुलने की तारीख 12 मई जुड़ी खास बात.

 
  • Dhirender Singh
  • 16 Feb 2024
  • 763
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देहरादून: उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ के कपाट खुलने की तिथि की घोषणा सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन करते हुए की गई है। 12 मई को बद्रीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिए जाएंगे। देवभूमि में बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने और बंद होने की प्रक्रिया बेहद रोचक होती है। बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि राजा की कुंडली के अनुसार तय होती है। वहीं इस दौरान सदियों से चली आ रही परंपराओं का भी विधि-विधान के साथ निर्वहन किया जाता है।

बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि हर वर्ष बसंत पंचमी के दिन टिहरी के राज दरबार में तय होती है। प्राचीन समय से मान्यता चली आ रही है कि राजा ही जनता के लिए भगवान हुआ करते थे और राजा के ग्रहों की अनुकूलता को देखते हुए ही राजपुरोहित बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने की तिथि घोषित करते थे। इस प्रक्रिया का आज भी अक्षरश: पालन होता है। यहां राजपुरोहित राजा की कुंडली ग्रहों की अनुकूलता को देख कर तिथि तय करते हैं। इसीलिए राजदरबार से महाराजा ही कपाट खुलने की तिथि की घोषणा करते हैं।

राजा के दर्शन से धाम का रास्ता

टिहरी दरबार के राज परिवार के लोग भगवान बद्रीनाथ के तेल कलश गाड़ू कलश को ले जाने की परंपरा का हजारों वर्षों से निर्वहन कर रहे हैं। टिहरी राजवंश के पहले राजा सुदर्शन शाह को जनता ने बोलांदा बद्रीश का नाम दिया था। पूर्व में मान्यता यह भी थी कि जो भक्त भगवान बद्री विशाल के दर्शन करने के लिए नहीं पहुंच पाते थे, उन्हें राजा के दर्शन मात्र से ही धाम के दर्शन के समान पुण्य मिल जाता था।

टिहरी नरेश के कुल देवता बद्री विशाल

श्री बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम के मीडिया प्रभारी डॉ. हरीश गौड़ के अनुसार राजशाही के समय से ही धाम की व्यवस्था राजमहल से की जाती रही है। इस कारण आज भी ज्योतिष गणना के बाद राजा की कुंडली में ग्रहों की अनुकूलता देखी जाती है। इसके बाद राजा की उपस्थिति में विधि विधान के साथ बद्री विशाल के कपाट खुलने का मुहूर्त तय किया जाता है। बताया कि भगवान बद्री विशाल ही टिहरी नरेश के कुल देवता थे, उनके नियंत्रण में ही इन सभी परंपराओं का पालन पूर्व से किया जाता है। इसी वजह से राजमहल से ही तिथि की घोषणा महाराज के द्वारा की जाती है।

कैसे होती है प्रक्रिया

बसंत पंचमी के दिन भगवान बद्री विशाल के कपाट खुलने की तिथि के साथ-साथ गाड़ू घड़ा प्रक्रिया की भी तिथि घोषित की जाती है। बसंत पंचमी के दिन होने वाली यह घोषणा बेहद महत्वपूर्ण होती है। भगवान बद्री विशाल के शीत निद्रा से उठने के बाद मानव पूजा के साथ कपाट खुलने का समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। गाड़ू घड़ा परंपरा के लिए नरेंद्र नगर राजमहल में महारानी की अगुवाई में तिल का तेल निकाला जाता है।

कपाट खोलने के कुछ दिन पहले ही गाड़ू घड़ा यात्रा के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है। इसमें नरेंद्र नगर राजमहल में महारानी राज्य लक्ष्मी शाह सुहागिन महिलाओं के साथ व्रत रखकर, पीले वस्त्र धारण कर मूसल-ओखली और सिलबट्टे से तिल का तेल पिरोती हैं। इस तेल को एक घड़े में भरा जाता है, जिसे गाड़ू घड़ा कहा जाता है। यह तेल कलश डिम्मर गांव स्थित श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर में रखा जाता है। धाम के कपाट खुलने के समय बद्रीनारायण की मूर्ति के अभिषेक के साथ ही छह माह तक इसी तिल के तेल का प्रयोग धाम में किया जाता है। अखंड ज्योति इसी तिल के तेल से जलाई जाती है।

तेल कलश की पूजा

डिम्मर गांव पहुंचने पर तेल कलश की पूजा अर्चना की जाती है और बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने से चार दिन पहले ही तेल कलश को डिम्मर गांव से जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर लाया जाता है। इसके बाद नृसिंह मंदिर से बद्रीनाथ के मुख्य पुजारी रावल की अगुवाई में तेल कलश के साथ आदि शंकराचार्य की गद्दी रात्रि विश्राम के लिए योग ध्यान बद्री मंदिर पांडुकेश्वर पहुंचती है। जहां से अगले दिन यात्रा बद्रीनाथ धाम के लिए रवाना होती है। इस यात्रा में गरुड़ जी, देवताओं के खजांची कुबेर जी और भगवान नारायण के बाल सखा उद्धव जी की डोलियां भी शामिल की जाती हैं।

भगवान विष्णु ने यहां की तपस्या

मान्यता है कि भगवान शंकर ने 6 वर्षों तक इस स्थान पर निवास किया था। वह 6 महीने बद्रीनाथ में और शेष 6 माह केदारनाथ में रहते थे। हिंदू अनुयायियों का दावा है कि उन्होंने अलकनंदा नदी में बद्रीनाथ के देवता की खोज की और इसे तप्त कुंड गर्म झरने के पास एक गुफा में स्थापित किया। वहीं पौराणिक कथा यह भी है कि यह वह स्थान है, जहां भगवान विष्णु ने कई वर्षों तक तपस्या की थी।
 

केदारनाथ धाम की तिथि होगी तय

बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि आज घोषित कर दी गई है। वहीं केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि 8 मार्च को शिवरात्रि के अवसर पर पंचकेदार गद्दी स्थल श्री ओंकारेश्वर मंदिर ऊखीमठ रुद्रप्रयाग में विधि-विधान से पंचांग गणना के पश्चात तय होगी। इसी दिन श्री केदारनाथ भगवान के पंचमुखी भोग मूर्ति के केदारनाथ धाम प्रस्थान का कार्यक्रम भी तय किया जाएगा। श्री गंगोत्री और श्री यमुनोत्री धाम के कपाट हर वर्ष अक्षय तृतीया के पावन अवसर पर खुलते हैं। इस वर्ष अक्षय तृतीया 10 मई को है। अप्रैल महीने में श्री गंगोत्री मंदिर समिति और श्री यमुनोत्री मंदिर समिति गंगोत्री, यमुनोत्री धाम के विधिवत कपाट खुलने की तिथि और समय का ऐलान किया जाएगा।
 

 

 

 

 



 

 

 
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