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अगर क्रिमिनल लॉ सबके लिए समान है तो नागरिक कानून भी समान क्यों नहीं होना चाहिए.. यूसीसी पर बोलीं ऋतु खंडूरी उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष .

 
  • Aishwarya Kumar Rai
  • 10 Feb 2024
  • 836
image  

 

 

देहरादून: उत्तराखंड विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक विधानसभा से पास हुआ और इस तरह यह आजादी के बाद वह देश में UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना। इस मौके पर राज्य के स्पीकर ऋतु भूषण खंडूरी से महेश पांडेय ने बातचीत की। पेश हैं बातचीत के अहम अंश:

समान नागरिक संहिता विधेयक पास हो गया है, इस पर आप क्या सोचती हैं?

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने से दशकों से चली आ रही कुरीतियां और कुप्रथाएं खत्म होंगी। सभी को एक समान अधिकार मिल सकेगा। बेटा-बेटी और स्त्री-पुरुष के बीच का भेदभाव खत्म होगा। यह एक ऐसा निर्णय है, जिसका पूरे देश में सकारात्मक प्रभाव पड़ने जा रहा है। इसमें बहुविवाह पर रोक लगाने, उत्तराखंड में बेटियों को बराबर हक देने और सभी धर्मों के लोगों के लिए गोद लेने और तलाक देने के मामलों में समान अधिकार सुनिश्चित करने की व्यवस्था स्वागत करने लायक है।

UCC को नाजुक मुद्दा बताते हुए कई राजनीतिक पार्टियां इसे लेकर आम राय बनाने की पक्षधर थीं। ऐसा किए बिना ही इसे लाना क्यों जरूरी लगा?

यह कहना सरासर गलत है कि इस पर लोगों की राय नहीं ली गई। प्रदेश के सभी जिलों में सभी वर्गों के लोगों से सुझाव प्राप्त किए गए। कुल 43 जनसंवाद कार्यक्रम किए गए। प्रवासी उत्तराखंडी भाई-बहनों के साथ 14 जून, 2023 को नई दिल्ली में चर्चा के साथ ही संवाद कार्यक्रम पूर्ण हुआ। इसके ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने में समाज के हर वर्ग से सुझाव आमंत्रित करने के लिए 8 सितंबर, 2022 को एक वेब पोर्टल भी लॉन्च किया था।
राज्य के सभी नागरिकों से SMS और वट्सऐप मेसेज द्वारा भी सुझाव आमंत्रित किए गए। इसके तहत समिति को 2,32,961 सुझाव प्राप्त हुए, जो कि प्रदेश के लगभग 10 फीसदी परिवारों के बराबर है। लगभग 10 हजार लोगों से संवाद और प्राप्त लगभग 2 लाख 33 हजार सुझावों का अध्ययन करने को समिति ने 72 बैठकें कीं।

यह कहना सरासर गलत है कि इस पर लोगों की राय नहीं ली गई। प्रदेश के सभी जिलों में सभी वर्गों के लोगों से सुझाव प्राप्त किए गए। कुल 43 जनसंवाद कार्यक्रम किए गए। प्रवासी उत्तराखंडी भाई-बहनों के साथ 14 जून, 2023 को नई दिल्ली में चर्चा के साथ ही संवाद कार्यक्रम पूर्ण हुआ। इसके ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार करने में समाज के हर वर्ग से सुझाव आमंत्रित करने के लिए 8 सितंबर, 2022 को एक वेब पोर्टल भी लॉन्च किया था।
 

राज्य के सभी नागरिकों से SMS और वट्सऐप मेसेज द्वारा भी सुझाव आमंत्रित किए गए। इसके तहत समिति को 2,32,961 सुझाव प्राप्त हुए, जो कि प्रदेश के लगभग 10 फीसदी परिवारों के बराबर है। लगभग 10 हजार लोगों से संवाद और प्राप्त लगभग 2 लाख 33 हजार सुझावों का अध्ययन करने को समिति ने 72 बैठकें कीं।

आप इसे ऐतिहासिक बता रही हैं, लेकिन विपक्ष का तर्क है कि यह समवर्ती सूची का विषय है। जब केंद्र सरकार कानून बनाती है तो यह सभी के लिए मान्य होता है और फिर राज्यों के बनाए गए कानून निष्प्रभावी हो जाते हैं। ऐसे में उत्तराखंड में इस पर इतना खर्च कर उसे लागू करने की जल्दबाजी क्यों है?

ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार इस मामले में कोई कदम नहीं उठा सकती। अगर उसने कोई कदम उठाया और इसे यहां से लागू करने की शुरुआत को लेकर कदम बढ़ाया है तो इसका तो सभी को स्वागत करना चाहिए। यह तो हमारे लिए गौरव और अभिमान का विषय होना चाहिए कि हमारा प्रदेश इसकी शुरुआत करने जा रहा है। जब इस देश में क्रिमिनल लॉ सबके लिए एक समान हैं तो सिविल लॉ भी सभी के लिए एक समान क्यों नहीं होने चाहिए? यह प्रश्न अब तक सब लोगों को मथता रहता था। इसके लागू होने के बाद लोगों के इस प्रश्न का यह एक सही जवाब होगा। हमारा संविधान भी सभी के लिए समान अवसर और एक समान न्याय की बात और उसकी हिमायत करता है।

इस संहिता के लागू होने का समाज पर क्या असर होगा, आम लोगों को इससे क्या हासिल होगा?

समाज का कोई भी धड़ा हो- चाहे महिला हो या पुरुष, अमीर हो या गरीब, जब हम सबके लिए एक नागरिक कानून की बात करते हैं तो यह सबको समान रूप से ट्रीटमेंट देने के लिए प्रेरित करता है। समाज का गरीब वंचित और सदियों से ठुकराया गया तबका जिसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है, अगर वह संविधान में दिए गए सभी के लिए समान अधिकार की जद में आता है तो उसे एक हौसला मिलता है और इससे देश के विकास में उसका योगदान भी सुनिश्चित करने में सफलता मिलती है।

समान नागरिक संहिता के बहाने कहीं असल मुद्दों से देश का ध्यान हटाने की कोशिश तो नहीं हो रही?

इसे राजनीति से जोड़कर देखने की जरूरत ही कहां है। देशहित का कोई भी मुद्दा दलगत राजनीति से ऊपर है। इसे विधानसभा में पारित कर मेरे विचार से हमारी सरकार ने देश को मजबूत कंधा देने की कोशिश की है, जिसका सभी को स्वागत करना चाहिए। जहां तक असली मुद्दे की बात है तो जनसामान्य की बराबरी की बात करना कहां से जनसामान्य के मुद्दों से ध्यान भटकाना है।


अनुच्छेद 371 (A) या छठी अनुसूची जैसे संवैधानिक प्रावधान जो अल्पसंख्यक, आदिवासी समुदायों के रीति-रिवाजों, मूल्यों और प्रथाओं की रक्षा के लिए प्रदान किए गए हैं, क्या इससे उन पर कोई असर नहीं होगा?

आदिवासियों और उनकी रीतियों को प्रभावित करने वाले प्रावधान इस मसौदे में नहीं हैं। उनके अपने रीति-रिवाजों को इसमें भी संरक्षण दिया गया है। इसमें किसी को भी उसके रीति-रिवाज मानने से कोई मनाही नहीं है।

ठीक लोकसभा चुनाव से पहले यह कवायद कहीं समाज में ध्रुवीकरण की कोशिश तो नहीं है?

क्या आपको लगता है कि इस देश का युवा किसी के भटकाने से भटकता है? अगर अठारह साल का युवा राम के साथ जुड़ा, तो उसे जबरदस्ती थोड़े ही जोड़ा गया। वह उस आइडियॉलजी के साथ जुड़ा।

 

 

 

 
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