देहरादून: लिव इन रिलेशनशिप को लेकर जहां अभिभावक इसके विरोध में हैं तो वहीं युवा लिव इन के पंजीकरण को सही बता रहे हैं। युवाओं का कहना है कि लिव इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन होने से लिव इन के मामलों में कमी आएगी और अनावश्यक विवाद भी नहीं होंगे। इस संबंध में अभिभावक निर्मला बिष्ट का कहना है कि लिव इन रिलेशनशिप को पंजीकृत कराकर सरकार एक तरह से शादी व्यवस्था को चुनौती दे रही है। बहुविवाह का प्रचलन तो प्राचीन काल से है, लेकिन इस तरह से अवैध कृत्यों को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
एक ओर हम पाश्चात्य संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, वेलेंटाइन डे जैसे पश्चिमी त्योहारों को मनाने से अपने बच्चों को रो रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर सरकार लिव इन जैसे संबंधों को कानूनी अमलीजामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। वर्तमान समय में कई लोग मजबूरी में लिव इन में रह रहे हैं। फिलहाल उनकी प्राइवेसी उनके हाथ में है, लेकिन इसका पंजीकरण होगा तो यह लिव इन में रहने वालों के संबंध तो सार्वजनिक तो होंगे ही साथ ही महिला के लिए भी मुसीबतें बढ़ेंगी।
अभिभावक डॉ. एसएन सचान ने कहा कि एक अभिभावक होने के नाते वे लिव इन रिलेशनशिप को ही गलत मानते हैं। वे अपने बच्चों को कभी भी लिव इन में रहने की अनुमति नहीं देंगे। किन्हीं परिस्थितियों में उनको रहना पड़ता है तो वे अपने घर पर इस बारे में नहीं बताते हैं। पंजीकरण की अनिवार्यता होने पर इस तरह के मामलों में कमी आएगी। क्योंकि कोई भी माता-पिता ये नहीं चाहेगा कि उनका बेटा या बेटी लिव इन रिलेशनशिप में रहे। बच्चों को अपने पार्टनर चुनने का अधिकार होना चाहिए, लेकिन पंजीकरण के दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। ऐसे में वैरिफिकेशन के नाम पर लिव इन में रहने वालों को प्रताड़ित किए जाने की आशंका भी बनी रहेगी।
युवा सचिन थपलियाल का कहना है कि छोटे प्रयासों के बिना बड़े काम असंभव है। भारत में पश्चिमी सभ्यता काफी हावी होने लगी है। उत्तराखंड देवभूमि है और यहां पर नारियों का सम्मान होता है, लेकिन सरकार को जो यह निर्णय है कि बिना पंडित, बिना अपनी भारतीय संस्कृति को आगे रख कर बिना शादी के लिव इन में रह लेंगे तो यह पश्चिमी संस्कृति को बढ़ावा देना है। यह अमेरिकीकरण की यह एक छोटी झलक है। सरकार को यह फैसले सांस्कृतिक संस्थाओं को छोड़ देना चाहिए।