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सहानुभूति, शक्ति प्रदर्शन, एकजुटता...रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली से निकले 5 बड़े संदेश.

 
  • Manjiri Chaturvedi
  • 01 Apr 2024
  • 798
image  

 

 

नई दिल्ली: देश में आम चुनावों की रणभेरी बजने के बाद दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में रविवार को हुई विपक्षी खेमे इंडिया गठबंधन की 'लोकतंत्र बचाओ' रैली में देश के तमाम विपक्षी नेताओं की हुई जुटान से जहां एक ओर मौजूदा चुनाव की स्वतंत्रता व निष्पक्षता को लेकर अपनी चिंता जाहिर की गई तो वहीं दूसरी ओर समूचा विपक्ष एकजुट होकर पीएम मोदी नीत एनडीए गठबंधन को चुनौती देता नजर आया। रैली में विपक्षी नेताओं ने अपने तीखे तेवरों से कहीं न कहीं सत्तारूढ़ दल को संदेश देने की कोशिश की कि पीएम मोदी के 'अबकी बार, 400 पार' के नारे से सजे विजय रथ को रोकने के लिए इंडिया गठबंधन पूरी तरह से तैयार व एकजुट खड़ा है। वहीं समूचे विपक्ष ने लोकतंत्र को बचाने के लिए देश के सामने पांच सूत्रीय मांग रखी, जिसे कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने पेश किया। इसके तहत चुनाव आयोग इस चुनाव में सबके समान अवसर सुनिश्चित करे और सरकार द्वारा विपक्ष के खिलाफ एजेंसियों की कार्रवाई पर रोक, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और झारखंड के सीएम की तत्काल रिहाई, राजनीतिक दलों के आर्थिक स्रोतों को बंद न किया जाए, चुनावी बांड की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी का गठन व चुनाव आयोग को स्वतंत्र रूप से काम करने देने की मांग की गई। इसी के साथ सभी दलों ने बीजेपी के खिलाफ एकजुटता से संघर्ष करने का संकल्प भी सामने रखा। हालांकि इस रैली में विपक्षी खेमे के बीच कुछ उलझन भी दिखाई दी। जैसे टीएमसी के नेता लेफ्ट के साथ दिखने से बचते नजर आए तो वहीं टीएमसी व एसपी के नेता इस रैली के आयोजन के लिए आम आदमी पार्टी की बात करते और कांग्रेस का नाम लेने से बचते दिखे।

विपक्ष का शक्ति प्रदर्शन

रविवार को रामलीला मैदान की रैली के विशाल मंच पर जिस तरह से विपक्षी खेमे के तमाम बड़े नेताओं का जमावड़ा दिखा, वह कहीं न कहीं विपक्ष के सफल शक्ति प्रदर्शन की कोशिश के तौर पर सामने आया। कांग्रेस सहित तमाम दलों की टॉप लीडरशिप, पंजाब व झारखंड जैसे राज्यों के सीएम, टीएमसी नेता ममता बनर्जी व डीएमके चीफ एम के स्टालिन जैसे शीर्ष नेतृत्व की गैरमौजूदगी में प्रतिनिधियों का जुटान और दोनों गिरफ्तार मुख्यमंत्रियों की पत्नियों ने एकसाथ मंच पर पहुंचकर कहीं न कहीं अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने इस रैली की तुलना लगभग 47 साल पहले जेपी नारायण के आह्वान पर इसी रामलीला मैदान में इमरजेंसी के खिलाफ हुई ऐतिहासिक रैली से कर डाली।

विपक्षी एकजुटता का संदेश

रविवार की इस रैली के जरिए विपक्षी खेमे इंडिया गठबंधन ने देश के सामने अपनी एकजुटता का संदेश भी दिया। दरअसल, जिस तरह से बीजेपी विपक्षी एकता को भानुमति का कुनबा कहती रही है और पिछले दिनों अलग-अलग राज्यों में बंटवारे को लेकर विभिन्न घटक दलों में खींचतान दिखाई दी, उसके बाद तमाम विपक्ष दलों ने एक साथ एक मंच पर जुटकर एक सुर में बीजेपी के खिलाफ एकजुटता से संघर्ष करने का संकल्प सामने रखने की कोशिश की। बंगाल में 'एकला चलो' का नारा बुलंद करने वाली टीएमसी ने रामलीला के ऐतिहासिक मंच से 'टीएमसी इंडिया गठबंधन का हिस्सा थी, है और रहेगी' कहकर विपक्षी एकता को मजबूत करने की कोशिश की। पंजाब में अलग-अलग चलने वाली आप हो या कांग्रेस अथवा केरल में अलग-अलग दिखने वाले कांग्रेस च लेफ्ट अथवा महाराष्ट्र व बिहार में सीटों के तालमेल को लेकर कांग्रेस से मोलभाव करने वाले आरजेडी व शिवसेना - सबने साथ आकर कहीं न कहीं संदेश देने की कोशिश की कि लोकतंत्र को बचाने जैसे बड़े हित के सामने उनके निजी हित गौण हैं।
 

इमोशनल कनेक्ट की कोशिश

इस रैली में विपक्ष ने जेल में रह रहे अपने दोनों मुख्यमंत्री साथियों अरविंद केजरीवाल और हेेमंत सोरेन के लिए दो खाली कुर्सियां छोड़कर या फिर उनकी गैरमौजूदगी में उनकी पत्नियों सुनीता केजरीवाल और कल्पना सोरेन के संबोधन के जरिए एक इमोशनल कनेक्ट बनाने की कोशिश करता भी नजर आया। जहां सुनीता केजरीवाल अपने पति का संदेश पढ़ती दिखीं, वहीं कल्पना सोरेन अपनी बात के जरिए पति के विचारों को रेखांकित नजर आईं। चुनाव से ठीक पहले विपक्ष ने इस कवायद के जरिए देश के लोगों को एक भावनात्मक संदेश देने की कोशिश की कि चुनाव से पहले कैसे सत्तारूढ़ दल चुने हुए मुख्यमंत्रियों को जेल में भेजकर उन्हें चुनावी व लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने से रोक रहा है। विपक्ष ने इस सबके पीछे बीजेपी की राजनीतिक मंशा को जिम्मेदार बताया।

चुनावी निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर दिखाई चिंता

रामलीला मैदान की रैली में लगभग समूचे विपक्ष में अपने-अपने तरीके से चुनाव की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। आजादी के बाद शायद यह पहला मौका होगा कि जब चुनाव की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर विपक्षी दलों ने इस तरह से अपने गंभीर सरोकार सामने रखे हाें। यहां तक की इमरजेंसी में इंदिरा गांधी नीत कांग्रेस को 'तानाशाह और मनमानी करने वाली सरकार' करार देने वाले विपक्ष ने इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में चुनावी निष्पक्षता को लेकर ऐसे सरोकार नहीं जताए थे। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने जहां मैच फिक्सिंग का उदाहरण देते हुए मौजूदा चुनाव में निष्पक्षता को लेकर अपनी आशंका जाहिर की तो वहीं दूसरी ओर अखिलेश यादव, उद्धव ठाकरे, शरद पवार, तेजस्वी यादव, सीताराम येचुरी व मल्लिकार्जुन खरगे जैसे नेताओं ने चुनाव से ऐन पहले दो चुने हुए मुख्यमंत्रियों को जेल भेजने का मुद्दा उठाते हुए संकेत देने की कोशिश की कि इस चुनाव में विपक्षी दलों को किस तरह से लेवल प्लेयिंग फील्ड मिलने से रोका जा रहा है। इतना ही नहीं, विपक्ष की ओर से 'बीजेपी के 400 पार' के लक्ष्य को हासिल करने के लिए बीजेपी द्वारा की जा रही कोशिशों को लेकर भी चिंता जताई गई। विपक्ष की यह चिंता ईवीएम में तथाकथित छेड़छाड़ से आगे जाती दिखी। उसका कहना था कि चुनाव से ठीक पहले विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं को जेल भेजकर, विपक्षी नेताओं पर एजेंसियों की जांच बैठा कर या विपक्षी दलों के आर्थिक स्रोत व संसाधनों पर रोक लगाकर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

 

अजेंडे की स्पष्टता नहीं

हालांकि रैली के जरिए विपक्ष ने जहां महंगाई, बेरोजगारी, संवैधानिक संस्थाओं व संविधान पर हमला, किसानों के मुद्दे जैसे मुद्दों को लेकर एक नैरेटिव सामने रखने की कोशिश की, लेकिन फिर भी चुनाव के बीच हुई इस रैली में विपक्ष की ओर रखे गए अजेंडे में स्पष्टता की कमी दिखी। कांग्रेस के पांच न्याय हो या फिर रैली में केजरीवाल की छह गारंटीज पर विपक्षी दलों के बीच कोई बात या जिक्र नहीं हुआ। वहीं इस रैली में प्रमुख मुद्दों को लेकर संयुक्त रूप से एक मेनिफेस्टो या कॉमन मिनिमम प्रोग्राम जैसी चीजों को लेकर स्पष्टता सामने नहीं आई। कांग्रेस आगामी पांच अप्रैल को अपना मेनिफेस्टो पेश करने जा रही है।
 

 

 

 

 

 
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