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ज्यादा मोबाइल फोन इस्तेमाल करने पर बच्चा ऑटिज्म का शिकार हो सकता है, विज्ञान के पास इसका कोई इलाज नहीं.

 
  • Lokesh K Bharti
  • 08 Apr 2024
  • 1099
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ऑटिज़म का पूरा नाम Autism Spectrum Disorder (ASD) है। इसे बीमारी कहना गलत है। यह एक अलग मानसिक अवस्था है। ऐसे बच्चों या लोगों का दिमाग सामान्य लोगों से कुछ अलग तरीके से काम करता है। चूंकि इसकी रेंज बहुत विस्तृत है, इसलिए इसे स्पेक्ट्रम कहा गया है। हकीकत यह है कि कई लोग इस अवस्था में सफल ज़िंदगी जीते हैं। ऐसे लोगों को ऑटिस्टिक (Autistic) भी कहते हैं।
 

ऐसे लोगों की कुछ खूबी होती हैं तो कुछ बड़ी कमियां भी। ये कमियां ही समस्या की जड़ होती हैं। जब इन समस्याओं की वजह से परिवार या समाज में इनका रहना मुश्किल हो जाता है, तब इस पर काम करने की ज़रूरत होती है। अगर लक्षण बचपन में ही पता चल जाएं तो ऐसे बच्चों को जरूरी स्किल सिखाना आसान हो जाता है। इसके बाद ये परिवार और समाज से आसानी से कदमताल कर पाते हैं।

हो सकती हैं कई खासियतें

मुमकिन है कि ऐसे लोगों के पास कई खासियतें ऐसी हों जो शायद दूसरों के पास न हों, लेकिन ऐसी सामान्य कमियां भी हो सकती हैं जिनकी वजह से वे सामान्य ज़िंदगी न जी पाएं। इस बात को भी बखूबी समझें कि फिलहाल साइंस के पास ऑटिज़म का इलाज नहीं है। लेकिन ऑटिज़म वाले बच्चे या शख्स की स्थिति या अवस्था में बेहतरी ज़रूर की जा सकती है। उन्हें अलग-अलग थेरपी के माध्यम से ट्रेंड कर सकते हैं। इससे उन्हें काफी फायदा होता है।

ऐसे पहचानें

अगर कोई बच्चा पैरंट्स या किसी जानने वाले के पुकारने पर रिऐक्ट न करे। ऐसा बार-बार हो तो जरूर सचेत हो जाएं। इसे अटेंशन डेफिसिट कहते हैं। वह बात करते समय आई कॉन्टेक्ट न करे। वह अक्सर नज़रें इधर-उधर फिराता रहे। 9 महीने की उम्र में अपने नाम को पहचानता न हो और नाम सुनकर जवाब न दे।

अपनी खुशी, उदासी, गुस्से व आश्चर्य की भावनाओं को न दिखा पाए। 12 महीने (1 साल) की उम्र में सामान्य खेल या किसी छोटी-सी चीज़ की कॉपी न कर पाए और बाय-बाय तक न कर पाए। इसके अलावा 15 महीने की उम्र में अपनी रुचियों को दूसरों के साथ साझा न करता हो, मसलन: कोई वस्तु दिखाना, खिलौने दिखाना।

18 महीने (1.5 साल) की उम्र में घर या बाहर बच्चों के लिए दिलचस्प चीज़ पर बिलकुल भी रिऐक्ट न करे या उंगली से इशारा न करे। मसलन: छिपकली, कोई जानवर, सूरज, चांद आदि को देखकर इशारा न करना। अगर ऐसा हो तो ध्यान दें। 24 महीने (2 साल) की उम्र में दूसरों की भावनाओं को समझने और सहानुभूति दिखाने में मुश्किल हो।

ये भी हैं लक्षण

36 महीने (3 साल) की उम्र में दूसरे बच्चों के साथ खेलने में बिलकुल भी रुचि न ले। 48 महीने (4 साल) की उम्र में कुछ भी बनने की कल्पना न करता हो, मसलन: टीचर, सिंगर, पुलिस या सुपरहीरो। 60 महीने (5 साल) की उम्र में गाना, डांस, ऐक्टिंग आदि न कर पाता हो। बर्ताव को बार-बार दोहराना
एक ही तरह की बात या काम को बार-बार करता हो। इसे रिपिटेटिव बिहेवियर कहते हैं।

बार-बार कोई शब्द या वाक्य दोहराना, जिसे Echolalia कहा जाता है। जैसे: 'पढ़ लिया, पढ़ लिया, पढ़ लिया...'। एक ही तरह का खेल, एक ही तरह के खिलौने से खेलता रहे। टोकने या मना करने पर बहुत ज्यादा नाराज़ हो जाए। अचानक बहुत हाइपर हो जाए। कुछ भी उठाकर फेंकने लगे। ऐसा बार-बार करे। रुटीन से हटने को तैयार न होना। बहुत ज्यादा उत्तेजित होकर एक ही बात पर बार-बार बिना मतलब ताली बजाना। शब्दों पर देंगे ध्यान तो समझ पाएंगे। 18 महीने तक का बच्चा: वह सिंगल शब्द बोल पाता हो।

मसलन: दूध, खाना, पापा, मम्मा, चाय आदि। 19 से 35 महीने तक का बच्चा: 2 से 3 शब्दों को जोड़कर फ्रेज बना पाता हो। मसलन: मुझे दे दो, वे आ गए, खेलना है, बाहर चलो, चलो न आदि। 36 से 42 महीने का बच्चा: एक छोटा पैराग्राफ बोल पाता हो। मसलन: मैं वहां गया था। वहां हमने आइसक्रीम खाई। बंटी ने चॉकलेट वाली ली थी और मैंने दूसरी वाली। फिर हम आ गए। दरअसल, इस समय तक बच्चे अमूमन प्ले स्कूल जाना शुरू कर देते हैं। स्कूल में सुनी कहानी को पैरंट्स को सुना देते हैं, भले ही टूटी-फूटी हो।

नोट: ऊपर जो लक्षण बताए गए हैं। वे किसी दूसरी बीमारी के भी हो सकते हैं। बिना डॉक्टरी जांच के किसी नतीजे पर न पहुंचें।

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