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जल संरक्षण एवं संवर्धन.

 
  • Dhirender Singh
  • 21 Mar 2024
  • 817
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सम्पूर्ण इतिहास में मानव सभ्यता की प्रगति में जल ने सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। मानव सहित समस्त जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए जल अनिवार्य आवश्यक घटक है। वर्तमान में मानवीय गतिविधियों के कारण भारत सहित दुनिया के कई देशों में जल का संकट गहराता जा रहा है। तापमान में हो रही वृद्धि तथा वैश्विक और क्षेत्रीय वर्षा पैटर्न स्थिति में परिवर्तन के कारण खाद्य सुरक्षा, मानव स्वास्थ्य और समग्र कल्याण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। 1993 से प्रतिवर्ष 22 मार्च को आयोजित होने वाला विश्व जल दिवस, मीठे पानी के महत्व पर ध्यान केंद्रित करने वाला एक वार्षिक संयुक्त राष्ट्र दिवस है। इसका उद्देश्य सुरक्षित पानी तक पहुंच के बिना रहने वाले लोगों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। विश्व जल दिवस का मुख्य फोकस सतत विकास लक्ष्य 6 की उपलब्धि का समर्थन करना और 2030 तक सभी के लिए पानी और स्वच्छता का लक्ष्य प्राप्त करना है। विश्व जल दिवस 2024 का विषय “शांति के लिए जल का लाभ उठाना”।

वर्तमान में सभी क्षेत्रों में जल की बढ़ती मांग तथा वर्षा के पैटर्न में व्यवधान के कारण भूजल पर निर्भरता बढ़ गई है। इसके उचित प्रबंधन और स्थायी रूप से उपयोग हेतु उचित कार्रवाई के साथ ठोस प्रयास किये जाने की महती आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट 2022 के अनुसार, भूजल पृथ्वी के सभी तरल मीठे पानी का लगभग 99 प्रतिशत है जिसमें समाज को सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ प्रदान करने की क्षमता है। भूजल पीने के पानी सहित घरेलू उद्देश्यों के लिये उपयोग किये जाने वाले कुल जल का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। भारत की जनसंख्या लगभग 1.4 अरब है जो विश्व में सर्वाधिक है। 2050 तक जनसंख्या बढ़कर 1.7 अरब होने का अनुमान है। विश्व बैंक के अनुसार, भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन लगभग 4 प्रतिशत लोगों के लिए पर्याप्त जल संसाधन हैं। भारत में लगभग 90 मिलियन को सुरक्षित पानी तक पहुंच नहीं है। भारत की सामान्य वार्षिक वर्षा 1100 मिमी है जो विश्व की औसत वर्षा 700 मिमी से अधिक है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जून-अगस्त 2023 के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून 42 प्रतिशत जिलों में सामान्य से नीचे रहा है। अगस्त 2023 में देश में बारिश सामान्य से 32 प्रतिशत कम और दक्षिणी राज्यों में 62 प्रतिशत कम थी। पिछले 122 वर्षों में अर्थात 1901 के पश्चात भारत में पिछले वर्ष अगस्त में सबसे कम वर्षा हुई। कम वर्षा से न केवल कृषि पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा, बल्कि इससे देश के विभिन्न क्षेत्रों में पानी की भारी कमी भी हो सकती है। भारत में एक वर्ष में उपयोग की जा सकने वाली पानी की शुद्ध मात्रा 1,121 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) अनुमानित है। हालाँकि, जल संसाधन मंत्रालय द्वारा प्रकाशित आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 में कुल पानी की माँग 1,093 बीसीएम और 2050 में 1,447 बीसीएम होगी। परिणामस्वरूप अगले 10 वर्षों में पानी की उपलब्धता में भारी कमी की संभावना है। भारत विश्व में भूजल का सबसे अधिक दोहन करता है। यह मात्रा विश्व के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े भूजल दोहन-कर्ता (चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका) के संयुक्त दोहन से भी अधिक है। फाल्कनमार्क वॉटर इंडेक्स अनुसार, भारत में लगभग 76 प्रतिशत लोग पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहे हैं। यद्यपि भारत में निष्कर्षित भूजल का केवल 8 प्रतिशत ही पेयजल के रूप में उपयोग किया जाता है। इसका 80 प्रतिशत भाग सिंचाई में उपयोग किया जाता है शेष 12 प्रतिशत भाग उद्योगों द्वारा उपयोग किया जाता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2030 तक देश की जल मांग उपलब्ध आपूर्ति की तुलना में दोगुनी हो जाएगी।

जल संकट और अत्यधिक दोहन को कम करने के लिए कई उपाय हैं। आधुनिक तकनीकों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिमोट सेंसिंग आदि का उपयोग करके पानी की खपत को मापा और सीमित किया जा सकता है। साथ ही, जल स्रोतों का विस्तार, जल दक्षता में सुधार, और जल संसाधनों की रक्षा करने से पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। इसके अतिरिक्त बरीड क्ले पॉट प्लांटेशन सिंचाई जैसे तकनीकी उपायों का भी उपयोग किया जा सकता है जो पानी की बचत और फसल की उत्पादकता में सुधार कर सकते हैं। अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जल संसाधनों की संरक्षा के लिए नीतियों में सुधार किया जाए और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का विस्तार किया जाए ताकि पानी की सटीक और सही खपत की सुनिश्चित हो सके। जल संरक्षण एवं भूजल रिचार्ज के लिए वाटरशेड मैनेजमेंट एक अच्छा विकल्प है। जलग्रहण विकास का उद्देश्य वर्षा जल की एक-एक बूंद का सरंक्षण, मिट्टी के कटाव को नियंत्रित करना, मिट्टी की नमी और पुनर्भरण (रिचार्ज) को बढ़ाना, मौसम की प्रतिकूलताओं के बावजूद प्रति यूनिट क्षेत्र और प्रति यूनिट जल की उत्पादकता को अधिकतम करना है। जल संरक्षण की परंपरागत प्रणाली पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। नदियां बारहमासी बनी रहें, इस हेतु प्रयास अतिआवश्यक है। गांवों में जल बजटिंग और जल ऑडिटिंग की स्पष्ट रूपरेखा बनाने के साथ-साथ प्रत्येक क्षेत्र में एक जल बैंक स्थापित करना आवश्यक है। जल संरक्षण में भूजल वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। साथ ही समाज में जल संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए समय-समय पर संगोष्ठी एवं सेमिनार आयोजित किए जाने चाहिए। वर्तमान परिस्थिति में इस समस्या के स्थायी समाधान हेतु जल संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सभी को सामूहिक प्रयास करने होंगे।

प्रोफेसर रवीन्द्र नाथ तिवारी
लेखक म.प्र. भोज (मुक्त) विश्वविद्यालय में क्षेत्रीय निदेशक हैं

 

 
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