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दलित वोट बैंक पर कब्जे की क्यों मची है होड़? मायावती की मुश्किल राह पर बीजेपी और इंडिया भी नजर रखे हुए हैं.

 
  • Aishwarya Kumar Rai
  • 10 May 2024
  • 968
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लखनऊ: अभी तक भाजपा ही दलित वोटरों को लुभाने में लगी थी। अब सपा ने भी डोरे डालने शुरू कर दिए हैं। यही वजह है कि अखिलेश यादव ने मायावती के परंपरागत वोट बैंक पर टिप्पणी की तो मायावती भड़क उठीं। उन्होंने सपा को घोर दलित विरोधी करार दिया। इससे साफ है कि यूपी में दलित वोटरों को अपने पाले में लाने के लिए अब बसपा, I.N.D.I.A. और NDA के बीच लड़ाई तेज हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या है इस लड़ाई की वजह? क्या तीन दशक से बसपा के साथ खड़ा दलित वोट बैंक अब छिटक रहा है और उस पर कब्जेदारी की लड़ाई शुरू हो चुकी है?

बसपा का लगातार घटा जनाधार

दलित वोट बसपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता है। बसपा का गठन 1984 में हुआ। बसपा ने 1993 में सपा के साथ मिलकर पहली बार सरकार बनाई और मायावती पहली बार यूपी की सीएम बनीं। तब से दलित बसपा का मजबूत वोट बैंक है। बसपा ने 2007 में 206 सीट लाकर यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। तब बसपा को 30.43% वोट मिले थे। उसके बाद से उसका जनाधार लगातार गिरता गया। विधानसभा चुनाव की बात करें तो 2012 में बसपा 80 सीटें जीत सकी और वोट प्रतिशत गिरकर 25.91% रह गया।

2017 में 22.23% वोट मिले और 19 सीटों पर संतोष करना पड़ा। 2022 में वोट प्रतिशत गिरकर 12.88% रह गया और पार्टी महज एक सीट जीत सकी। इसी तरह का हाल लोकसभा चुनाव में भी रहा। बसपा ने 2009 में 27.42% वोट के साथ 20 सीटें हासिल की थीं। 2014 में वोट प्रतिशत 19.60% रह गया और एक भी सीट नहीं मिली। पार्टी ने 2019 का लोकसभा चुनाव सपा के साथ मिलकर लड़ा तो 10 सीटों पर जीत मिली लेकिन वोट प्रतिशत 19.43% ही रह गया।

छिटक रहा परम्परागत वोट बैंक?

बसपा के लगातार गिरते वोट प्रतिशत को लेकर ही यह बात उठ रही है कि दलित वोट भी उससे खिसक रहा है। यह चर्चा 2022 में और तेज हो गई जब उसे 13% से भी कम वोट मिले। प्रदेश में दलित आबादी 20% से अधिक है। ऐसे में 13% से भी कम वोट मिलना यह बताता है कि दलित वोटों का एक हिस्सा छिटका है। भाजपा पहले से इस वोट बैंक पर नजर लगाए हुए है। अखिलेश यादव भी इस कोशिश में जुट गए हैं कि अगर इस बार वोट बैंक और खिसकता है तो वह उनके पाले में आ जाए।

कितनी मुश्किल है बसपा की राह?

घटते जनाधार और दलित वोट बैंक पर जंग के साथ ही बसपा के लिए और भी चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। बसपा के पास खुद मायावती ही इकलौता बड़ा चेहरा बची हैं। एक समय में बसपा के पास रहे कई बड़े चेहरे अब नहीं हैं। अब आकाश आनंद को चेहरे के तौर पर पेश किया गया तो कुछ उम्मीद बढ़ी थी, लेकिन लोकसभा चुनाव के बीच में ही उनको हटाए जाने से एक बड़ा झटका लगा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अब बसपा की आगे की राह कितनी मुश्किल होगी? क्या बसपा अब नए नेता कैसे तैयार करेगी और घटते जनाधार को कैसे रोकेगी?

नहीं रहे चेहरे

मायावती के अलावा सतीश चंद्र मिश्र पिछले चुनाव तक बड़ा चेहरा थे। वह पार्टी में हैं, लेकिन चुनाव में कहीं नजर नहीं आ रहे। इसके अलावा नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाला, आरके चौधरी, ब्रजेश पाठक, रामवीर उपाध्याय, दद्दू प्रसाद, दीनानाथ भाष्कर, लालजी वर्मा, राम अचल राजभर, सुखदेव राजभर, बरखू राम वर्मा जैसे बड़े चेहरे बसपा के पास हुआ करते थे। अब ऐसा कोई चेहरा नहीं है।
 

आकाश की राह भी मुश्किल

आकाश आनंद को मायावती ने राष्ट्रीय को-ऑर्डिनेटर और अपना उत्तराधिकारी बनाकर नए लोगों और खासकर युवाओं को जोड़ने की जिम्मेदारी दी थी। पिछले साल उनको चार राज्यों के विधानसभा चुनाव का जिम्मा सौंपा गया। वहां आकाश कुछ खास हासिल नहीं कर सके। उसके बाद अब लोकसभा चुनाव में उनको आगे किया गया। अचानक उनको पद से हटा दिया। ऐसे में नया नेतृत्व तैयार करने की कोशिश को झटका लगा है। साथ ही आकाश के लिए भी आगे की राह आसान नहीं होगी। उनके लिए अपने ऊपर लगा विफलता का टैग हटाना भी आसान नहीं होगा।

 

 
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