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कोई कानून नहीं ,सोच बदलने की सोचो, शिशु लिंग परीक्षण की इजाजत देना ठीक नहीं है.

 
  • Nasira Sharma
  • 12 May 2024
  • 1356
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इंडियन मेडिकल असोसिएशन (IMA) अध्यक्ष डॉ आरवी अशोकन ने गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण को लेकर एक बहस शुरू की है कि कुछ शर्तों के साथ गर्भ में शिशु का लिंग परीक्षण होना चाहिए और इसके लिए PNDT (Pre-conception & pre-Natal Diagnostic Techniques) एक्ट में कुछ ढील भी दी जानी चाहिए। उनकी दलील है कि मौजूदा कानून के तहत जो डॉक्टर फॉर्म F ठीक से नहीं भर रहे हैं, उन्हें अपनी इस लापरवाही के लिए वही सजा दी जा रही है जो भ्रूण की जांच करने पर दी जाती है।

कड़ी सजा : गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण की भारत में 3 वर्ष की कड़ी सजा है। जाहिर है इसमें एक बार पकड़े जाने पर डॉक्टर का पूरा करियर जाता रहता है। बाद में उसे काम नहीं मिलता। अगर किसी तरह काम मिल भी जाए तो उसके व्यक्तित्व का हृास हो चुका होता है। डॉ आरवी अशोकन ने इस बात को नजर में रखते हुए कहा है कि परीक्षण की इजाजत मिलनी चाहिए ताकि पता चल सके कि शिशु कन्या है और फिर यह सुनिश्चित किया जाए कि उसे किसी तरह की हानि न पहुंचे।

व्यावहारिक नहीं : यह एक अच्छी सोच हो सकती है परंतु व्यावहारिक नहीं है। कुछ डॉक्टर कसम खाने के बावजूद ये काम करते हैं। यदि कानून हटा दिया गया तो क्या गारंटी है कि बच्ची मारी नहीं जाएगी? हमारे देश में भ्रूण हत्या तक ही मामला नहीं रहता है बल्कि लड़की की पूरी जिंदगी खतरे में रहती है। इसलिए मेरा मानना है कि कानून बदलने की जगह समाज की सोच बदलने पर ध्यान दिया जाए। यह काम डॉक्टर अच्छी तरह कर सकते हैं।

कहानी पर मिली प्रतिक्रिया : काफी पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘अपनी कोख।’ इसकी कथावस्तु यह थी कि साधना दो बेटियों के बाद जब तीसरी बार मां बनने को होती है तो परिवार के दबाव में टेस्ट कराती है जिसमें लड़का निकलता है। इस पर वह अपना अबॉर्शन करा लेती है और सास से झूठ बोलती है कि इस बार भी लड़की थी।

फैसले के पीछे : फैसले के पीछे उस पात्र की सोच यह थी कि कि भाई आएगा तो दोनों बहनों की पूरी जिंदगी एक साये में आ जाएगी। फिर वे उतना पनप नहीं पाएंगी। उनकी पढ़ाई में कमी रह जाएगी और उनकी शादियां हो जाएंगी, जैसा कि खुद उसके साथ हुआ था। इस कहानी पर मिली प्रतिक्रियाएं भी काफी कुछ कहती हैं।

टीचर्स का सवाल : इस कहानी को मैंने करनाल के B.Ed गणेशदास कॉलेज में पढ़ा था। वहां श्रोता लड़कियों से जब सवाल-जवाब हुआ तो सब चुप रहीं मगर टीचरों ने उग्र प्रतिक्रिया देते हुए सवाल किया कि जब लड़का था तो उसकी हत्या क्यों करवाई गई। इसके बाद मैंने यही कहानी बाल भवन टीचर्स ट्रेनिंग टीचरों के सामने पढ़ी। सभी का ख्याल था कि लड़के की भ्रूण हत्या नहीं होनी चाहिए थी।

प्ले किया गया : इसके बाद कल्चरल एक्टिविस्ट राजीव रंजन और उनकी पत्नी रीता ने एक वर्कशॉप करके ‘साधना’ नाम से ड्रामा बनाया, जिसके हरियाणा में 300 शो हुए। खास बात यह कि हर शो के बाद शपथ लेनी पड़ती थी कि कोई गर्भ की जांच नहीं करवाएगा, बच्चा चाहे लड़का हो या लड़की। दोनों को खुदा की नेमत समझना चाहिए।

जन्म के बाद के हालात : मैं कोई out of the way जाकर बात नहीं कर रही, IMA अध्यक्ष की ही बात का जवाब दे रही हूं। जन्म के बाद भी अगर लड़की है तो उसे कुछ पिला न दिया जाए या उसका गला न घोट दिया जाए, यह पक्का करने में डॉक्टर बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इस मानसिकता को बदलने के लिए समाज में अपना योगदान कर सकते हैं।

भ्रष्टाचार का असर : आज के जमाने में लड़कियां मां-बाप का ख्याल रख रही हैं। बहुत सी चीजों को वे बदल भी रही हैं और देश के निर्माण में भी उनका योगदान हो रहा है। ऐसे में मुझे लगता है कि अगर गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण शुरू हो गया तो हमारे समाज में जो परत-दर-परत भ्रष्टाचार है, वह इस मामले में भी रंग नहीं दिखाने लगेगा? जो लोग चुपचाप ऐसे परीक्षण करते हैं, क्या वे उसका रेकॉर्ड रखने में हेरफेर नहीं करेंगे? इस सुझाव पर एक बार फिर से विचार करने की जरूरत है।
 

कानून का खौफ : अभी PNDT कानून के खौफ के चलते लोग टेस्ट नहीं कराते। अगर कराते भी हैं तो बहुत छुप-छुपाकर कराते हैं। लेकिन जब यह खुलेआम होने लगेगा, कानून की रोक हट जाएगी तो उसका नतीजा ऐसे देश में क्या निकलेगा, जहां हर कदम पर भ्रष्टाचार व्याप्त है? डॉ अशोकन की इस बात के लिए जरूर तारीफ की जा सकती है कि उन्होंने डॉक्टरों की तकलीफ को उजागर किया लेकिन उनकी चिंता एकतरफा है। जब सजा इतनी कड़ी है तो डॉक्टर या एडमिनिस्ट्रेशन ऐसी लापरवाही क्यों करते हैं?

डॉक्टरों की वर्किंग कंडिशन : छोटे अस्पतालों में पहले ही बहुत तकलीफदेह हालात में डॉक्टर काम कर रहे हैं। मैंने सरकारी अस्पतालों में उनकी दशा देखी है, वे मरीजों की बड़ी तादाद को हैंडल करते हैं, और उनकी तनख्वाह भी बहुत कम है। इस हालात में सिर्फ फॉर्म F भरने या ना भरने की ही नहीं, और भी तरह की गलतियां या लापरवाहियां उनसे हो सकती हैं।

(लेखिका जानी मानी साहित्यकार हैं)

 

 

 

 
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