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उत्तराखंड में चुनावी माहौल गरम, बीजेपी के 'अश्वमेध' को कांग्रेस-बसपा की चुनौती, जानें सभी 5 सीटों का हाल.

 
  • Raghvendra Shukla
  • 12 Apr 2024
  • 830
image  

 

 

देहरादूनः उत्तराखंड में चुनावी माहौल गरमा रहा है। यहां 19 अप्रैल को मतदान होना है और निर्वाचन आयेाग के साथ ही प्रत्याशियों ने अपनी कमर कसी हुई है। कांग्रेस और भाजपा जहां अपनी मोर्चाबंदी में जुटे हुए हैं। वहीं बसपा भी पहाड़ चढ़ने के साथ ही तराई में कब्जा करने की जुगत में लगी हुई है। भाजपा के स्टार प्रचारक काफी हद तक मतदाताओं के रूख को अपनी ओर करने में सफल हो रहे हैं। उत्तराखंड की पांचों संसदीय सीटों पर वर्तमान में भाजपा के सांसद काबिज हैं और इस वर्चस्व को बनाए रखना भाजपा के लिए चुनौती है क्योंकि कांग्रेस प्रत्याशी भी पूरी तरह से जंग के मैदान में उतरे हुए हैं। वहीं निर्दलीयों ने भी बीजेपी-कांग्रेस की नाक में दम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

1. हरिद्वार संसदीय सीट

विश्व प्रसिद्ध और धार्मिक महत्व रखने वाला हरिद्वार संसदीय क्षेत्र कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इस संसदीय सीट से 14 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। भाजपा-कांग्रेस के साथ ही बसपा प्रत्याशी पूरी तरह से प्रचार में जुटे हुए हैं तो वहीं निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव में साम-दाम-दंड-भेद के साथ मैदान में उतरे हैं। हरिद्वार लोकसभा सीट में भाजपा प्रत्याशी त्रिवेंद्र सिंह रावत मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं। यहां उनके पक्ष में यह बात साफ है कि कैडर वोट के साथ-साथ जनता के बीच जाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी हुई है। टिकट मिलने के बाद से ही पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा लोकसभा प्रत्याशी त्रिवेंद्र सिंह रावत क्षेत्र में चुनाव प्रचार में जुट गए थे।

यहां भाजपा अन्य दलों के मुकाबले मजबूत स्थिति में इसलिए भी है क्योंकि 14 विधानसभा क्षेत्र में से 6 पर भाजपा के विधायक हैं। तीन में से दो नगर निगम पर भाजपा के महापौर हैं जबकि जिला पंचायत और सभी क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष के पद भाजपा के पास हैं। वहीं कांग्रेस के पास हरिद्वार संसदीय सीट पर 14 में से 5 विधायक हैं। हरिद्वार नगर निगम मेयर पद पर कांग्रेस काबिज रही है लेकिन जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत में कांग्रेस केवल सदस्यों तक ही सीमित रही है। 11 अप्रैल को ऋषिकेश में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा ने भी काफी हद तक टिहरी और हरिद्वार लोकसभा सीटों के मतदाताओं को साधने का काम किया है।

बीजेपी स्टार प्रचारक फॉर्म में

कांग्रेस के स्टार प्रचारक जहां अभी चुनाव मैदान में उतरे भी नहीं हैं। उत्तराखंड में भाजपा के स्टार प्रचारक जनसभाएं करने में अव्वल साबित हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही कुमाऊं और गढ़वाल में दो रैलियां हो चुकी हैं जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की जनसभाएं भी होनी हैं। उनके साथ ही केंद्रीय मंत्रियों की रैलियां भी उत्तराखंड में होने वाली हैं जो प्रत्याशियों की स्थिति को और मजबूत करेंगे।

बसपा ने त्रिकोणीय बनाया मुकाबला

हरिद्वार संसदीय सीट पर बसपा ने मुकाबला त्रिकोणीय बनाने की कोशिश की है। बसपा ने हरिद्वार संसदीय सीट से मुस्लिम प्रत्याशी जमील अहमद को मैदान में उतारा है। जमील अहमद मुजफ्फरनगर की जानसठ विधानसभा से विधायक रहे हैं। बसपा की यहां से रणनीति यह है कि कैडर वोट के साथ ही मुस्लिम मतदाताओं को भी लामबंद करे। अगर हरिद्वार सीट से कैडर बोर्ड के साथ ही मुस्लिम मतदाता भी बसपा के पक्ष में आ जाते हैं तो पार्टी इस सीट पर मुकाबले को रोचक बना सकती है। वहीं निर्दलीय प्रत्याशी और हरिद्वार के खानपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक उमेश कुमार भी मुकाबले में शामिल होने की पुरजोर कोशिश में लगे हुए हैं। हालांकि चुनावी रण कांग्रेस-बीजेपी और बसपा के त्रिकोणीय मुकाबले तक ही सिमटता नजर आ रहा है लेकिन पलड़ा भाजपा का ही भारी दिख रहा है।

निशंक का टिकट कटा

हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र में 70% क्षेत्र ग्रामीण है जबकि शेष शहरी क्षेत्र है। इस संसदीय सीट पर देहरादून की तीन विधानसभा सीटें आती हैं। हरिद्वार संसदीय सीट से भाजपा ने लगातार दो बार सांसद रहे पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक का टिकट काटकर पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को चुनाव मैदान में उतारा है। त्रिवेंद्र सिंह रावत पार्टी की मजबूती और बेहतर चुनाव प्रबंधन के साथ चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं और अपने प्रतिद्वंदी प्रत्याशियों से आगे नजर आ रहे हैं। भाजपा प्रत्याशी और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कहना है कि प्रधानमंत्री ने उत्तराखंड को हमेशा वरीयता पर रखा है। केंद्र और राज्य सरकार ने विकास योजनाओं को तेज गति से उत्तराखंड में लागू करवाया है।

हरीश रावत के बेटे से मुकाबला

कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पुत्र वीरेंद्र रावत को हरिद्वार सीट से अपना प्रत्याशी बनाया है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत हरिद्वार से सांसद रह चुके हैं और इस क्षेत्र में उनकी अच्छी पकड़ भी मानी जाती है। हरिद्वार ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र से हरीश रावत की पुत्री अनुपमा विधायक हैं। लोकसभा चुनाव में पिता के सहारे पुत्र चुनावी नैय्या पार लगाने में जुटे हुए हैं लेकिन इन दिनों पार्टी के अकाउंट फ्रीज होने का हवाला देते हुए वीरेंद्र रावत सोशल मीडिया के जरिए जनता से आर्थिक मदद भी मांग रहे हैं। वोट और समर्थन के साथ ही आर्थिक मदद की गुहार सोशल मीडिया में छाई हुई है।

कांग्रेस प्रत्याशी वीरेंद्र रावत का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में भाजपा ने विकास कार्यों के नाम पर केवल दिखावा ही किया है। कांग्रेस को किसानों श्रमिकों युवाओं और महिलाओं की चिंता है। वहीं बात करें निर्दलीय लोकसभा प्रत्याशी उमेश कुमार की तो वह 2022 में खानपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़े और भाजपा को हराकर जीत हासिल की। खानपुर विधायक तब से लगातार भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ मुखर हैं और अपनी विधानसभा क्षेत्र में उनका विशेष जनाधार भी है। कांग्रेस-बीजेपी और बसपा के लिए निर्दलीय प्रत्याशी परेशानी खड़ी कर सकते हैं और मुकाबले में कड़ी चुनौती भी दे सकते हैं। बात करें अन्य प्रत्याशियों की तो फिलहाल मुकाबले में सभी पीछे चल रहे हैं या यह कहना भी गलत नहीं होगा कि चुनाव प्रचार की दौड़ में भी अन्य प्रत्याशी नदारद ही हैं।

2. टिहरी लोकसभा सीट

टिहरी संसदीय क्षेत्र में 11 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। टिहरी लोकसभा क्षेत्र का चुनाव भी काफी रोचक बना हुआ है। दो बुजुर्ग प्रत्याशियों के बीच एक युवा प्रत्याशी ने मुकाबले को त्रिकोणीय और रोचक बनाया हुआ है। टिहरी संसदीय क्षेत्र पर देहरादून की सात विधानसभा क्षेत्र के वोटरों का भी बड़ा दारोमदार रहेगा। देहरादून की सातों विधानसभा सीटों से जो प्रत्याशी बढ़त बनाएगा संभवत: संसद की राह उसके लिए आसान होगी। देहरादून की 7 सीटों पर सवा आठ लाख तो टिहरी और उत्तरकाशी जिले के साथ विधानसभा क्षेत्र में कुल 7.30 लाख वोटर हैं। नई टिहरी संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 14 विधानसभा सीटों में से 11 पर भाजपा, दो पर कांग्रेस और एक पर निर्दलीय विधायक काबिज हैं।

त्रिकोणीय मुकाबला

इस सीट पर भले ही 11 प्रत्याशी हों लेकिन भाजपा कि सिटिंग एमपी माला राज्यलक्ष्मी शाह, कांग्रेस के जोत सिंह गुनसोला और निर्दलीय प्रत्याशी बॉबी पंवार के बीच चुनाव प्रचार में भी कड़ी टक्कर चल रही है। इस संसदीय सीट से राजशाही परिवार की माला राज्य लक्ष्मी शाह तीन बार सांसद बन चुकी हैं और चौथी बार चुनाव मैदान में है। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी जोत सिंह गुनसोला दो बार मसूरी के पालिका अध्यक्ष रहने के साथ ही दो बार मसूरी विधायक भी रहे हैं। उधर उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष बॉबी पंवार जो 2023 में बेरोजगारों के लिए आंदोलन के दौरान चर्चाओं में आए पूरी तरह से चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं।

निर्दलीय की चुनौती

बॉबी पंवार चकराता क्षेत्र के रहने वाले हैं और काफी हद तक इस विधानसभा क्षेत्र के वोटों को प्रभावित भी कर सकते हैं। बॉबी पंवार को उत्तराखंड क्रांति दल ने भी अपना समर्थन दिया है तो वहीं क्षेत्र में कई जगहों पर पूर्व सैनिक भी बॉबी पंवार के समर्थन में चुनाव प्रचार करते नजर आ रहे हैं। जोत सिंह गुनसोला और राज्य लक्ष्मी शाह के प्रतद्वंदी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे निर्दलीय और युवा प्रत्याशी बॉबी पंवार का पलड़ा चुनाव प्रचार में भले ही भारी दिख रहा हो लेकिन परिणाम भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में ही जाते दिख रहा है।

हालांकि कई जगहों पर राजशाही को खत्म करने की आवाज भी उठ रही है पर कांग्रेस प्रत्याशी का जनाधार अपने ही क्षेत्र तक सिमटने के कारण मुकाबला हल्का दिखाई दे रहा है। इधर हाथी ने भी पहाड़ चढ़ने की कोशिश की है और नेमचंद छुरियाल को अपना प्रत्याशी बनाया है। टिहरी संसदीय सीट से जहां अपने मजबूत कैडर वोट को लेकर भाजपा और कांग्रेस आश्वस्त है तो वहीं बेरोजगार युवा और पूर्व सैनिक बॉबी पंवार के साथ नजर आ रहे हैं। ऐसे में बसपा प्रत्याशी कितने वोट पा सकेंगे यह समझा जा सकता है।

3. पौड़ी गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र

पौड़ी गढ़वाल लोकसभा सीट को गढ़वाल सीट के नाम से भी जाना जाता है। गढ़वाल लोकसभा सीट में 13 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस-बीजेपी, उत्तराखंड क्रांति दल, बसपा, अखिल भारतीय परिवार पार्टी, बहुजन मुक्ति पार्टी, उत्तराखंड सामान्य पार्टी सोशलिस्ट, यूनिटी सेंटर ऑफ़ इंडिया (कम्युनिस्ट), सैनिक समाज पार्टी के साथ ही चार निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव मैदान में है। हालांकि इन 13 प्रत्याशियों में से मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है। इस सीट पर भाजपा की ओर से राज्यसभा सदस्य और राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख अनिल बलूनी चुनाव मैदान में हैं तो वहीं कांग्रेस ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल को अपना प्रत्याशी बनाया है।

जातीय समीकरण

इस सीट पर वोटों का समीकरण ठाकुर और ब्राह्मणों के वर्चस्व में बंटा नजर आता है लेकिन इस समय दोनों ही प्रत्याशियों को लेकर मतदाताओं का रुख स्पष्ट नहीं हो रहा है। हालांकि स्थानीय लोग चुनाव में स्थानीय नेता को ही उतारने की पैरवी करते रहे हैं। जनता दोनों ही प्रत्याशियों के साथ दिखाई दे रही है लेकिन वोटों के नाम पर मतदाताओं की चुप्पी ने दोनों ही दलों की चिंता भी बढ़ा रखी है। इस संसदीय सीट पर पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग के 11 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं।

कुल 14 विधानसभा सीटों में से शेष तीन टिहरी जिले की दो विधानसभा देवप्रयाग और नरेंद्र नगर नैनीताल जिले की रामनगर विधानसभा सीट शामिल है। यहां चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशियों के लिए विषम परिस्थितियां हैं क्योंकि यह संसदीय क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से राज्य के 5 जिलों में फैला हुआ है। इस चुनावी दंगल में प्रत्याशियों को चीन-तिब्बत की सीमांत क्षेत्र नीती-माणा, केदारनाथ घाटी सहित उच्च हिमालयी क्षेत्र की खड़ी चढ़ाई वाले दुर्गम स्थलों तक जनसंपर्क करना बेहद चुनौती पूर्ण है।
 

तराई क्षेत्र में कोटद्वार से लेकर रामनगर तक की दौड़ भी प्रत्याशियों को पूरी करनी है। ऐसे में राष्ट्रीय दलों के प्रत्याशी तो फिर भी पांचों जिलों तक पहुंच रहे हैं लेकिन अन्य प्रत्याशियों के लिए यह बेहद चुनौती पूर्ण प्रचार है। इन प्रत्याशियों में से भी कांग्रेस के प्रत्याशी पिछले दिनों पार्टी के अकाउंट फ्रीज होने की बात कह कर जनता से चंदा देकर आर्थिक मदद जुटाने का आह्वान कर चुके हैं। इस सीट का इतिहास देखें तो 1951 में यहां पहला लोकसभा चुनाव हुआ। इस सीट का नाम गढ़वाल डिस्टिक (ईस्ट) कम मुरादाबाद डिस्टिक (नॉर्थ ईस्ट) हुआ करता था। 1977, 1980 और 1989 को छोड़कर यह सीट बीजेपी और कांग्रेस के पास ही रही।

इस संसदीय क्षेत्र में 86% हिंदू, 8% मुस्लिम, चार प्रतिशत सिख और दो प्रतिशत इसाई मतदाता हैं। यहां 46% ठाकुर 26% ब्राह्मण और 8% एससी-एसटी व ओबीसी तथा 6% वैश्य व अन्य है। हालांकि यह सामाजिक समीकरण अन्य चुनाव में दिखाई देता है लेकिन लोकसभा चुनाव में इसका प्रभाव कम ही नजर आता है। गढ़वाल सीट से भाजपा के प्रत्याशी अनिल बलूनी पार्टी में राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी की महत्वपूर्ण पद पर है। उधर कांग्रेस प्रत्याशी गणेश गोदियाल वर्ष 2019 से इस लोकसभा क्षेत्र में सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। गोदियाल कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रहने के दौरान इस क्षेत्र में पार्टी कार्यकर्ताओं में पदाधिकारी के साथ अच्छे संबंध स्थापित किया और क्षेत्र में सक्रियता भी चुनाव में उनके पक्ष में जाती हुई दिख रही है।

भाजपा का दबदबा

गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र की कुल 14 विधानसभा सीटों में से 13 सीटों पर भाजपा का कब्जा था। लोकसभा चुनाव के दौरान ही कांग्रेस के एकमात्र विधायक राजेंद्र भंडारी भी भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा के विधायकों की संख्या भले ही जस की तस हो लेकिन कांग्रेस के पास एक ही सीट थी और अब वह भी खाली हो गई है। नगर निकायों और पंचायत में भी भाजपा मजबूत स्थिति में है। रुद्रप्रयाग व पौड़ी में जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर भाजपा काबिज है। चमोली सहित इन तीन जिलों के 79 जिला पंचायत सदस्य में से 41 जिला पंचायत सदस्य भाजपा के हैं। 27 ब्लॉक प्रमुखों में से 19 भाजपा के हैं जबकि नगर निकायों में 12 नगर परिषद पालिका परिषद में से 9 पर भाजपा का कब्जा रहा है।

नगर पंचायत में भी 9 पर भाजपा का कब्जा था हालांकि अब नगर निकाय भंग हो चुकी है। गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र में नगर निकायों में कांग्रेस की स्थिति मजबूत रही है। रामनगर, श्रीनगर और कोटद्वार विधानसभा क्षेत्र में नगर निकाय सीटों पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। कोटद्वार नगर निगम में जहां कांग्रेस का मेयर था तो वहीं रामनगर और श्रीनगर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद पर भी कांग्रेस का कब्जा रहा है। चमोली जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर अभी भी कांग्रेस का ही कब्जा है जबकि 79 में से 38 जिला पंचायत सदस्य कांग्रेस के हैं। तीन जिलों में 8 ब्लाक प्रमुख, तीन नगर पालिका अध्यक्ष, 2 नगर पंचायत अध्यक्ष कांग्रेस के पास हैं। गढ़वाल लोकसभा प्रत्याशी अनिल बलूनी केंद्र सरकार की उपलब्धियां को लेकर चुनाव मैदान में है।

4. नैनीताल-ऊधम सिंह नगर लोकसभा क्षेत्र

कुमाऊं में दो लोकसभा सीटें हैं। नैनीताल-ऊधम सिंह नगर सीट पर 10 प्रत्याशी मैदान में डटे हुए हैं। इनमें भाजपा-कांग्रेस, बसपा, उत्तराखंड क्रांति दल के साथ ही अन्य पार्टियों के प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। यहां से भाजपा के सिटिंग एमपी अजय भट्ट और कांग्रेस के प्रकाश जोशी चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस प्रत्याशी प्रकाश जोशी कांग्रेस नेता राहुल गांधी के काफी करीबी माने जाते हैं और इसी वजह से उनका टिकट दिए जाने की चर्चाएं भी हैं। नैनीताल-उधम सिंह नगर लोकसभा सीट उत्तराखंड के दो जिलों को मिलकर बना है।

इसमें उधम सिंह नगर के साथ ही नैनीताल का एक बड़ा हिस्सा शामिल होता है। नैनीताल-उधम सिंह नगर लोकसभा सीट का गठन 2008 में हुए परिसीमन के बाद हुआ था। विश्व प्रसिद्ध नैनीताल जहां पर्यटन के लिहाज से काफी अहम माना जाता है। वहीं उधम सिंह नगर औद्योगिक क्षेत्र के रूप में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। यहां पर लगभग 1000 से अधिक औद्योगिक इकाइयां लगी हुई है तो वहीं भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो उधम सिंह नगर का खटीमा शहर नेपाल से लगा हुआ है और इसका काफी बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा हुआ है। इसी लोकसभा क्षेत्र में जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क भी आता है।

जातीय समीकरण

नैनीताल उधम सिंह नगर लोकसभा सीट में कुल 14 विधानसभा सीटें आती हैं। नैनीताल जिले में पांच और उधम सिंह नगर जिले में नौ विधानसभा क्षेत्र शामिल है। इस संसदीय सीट पर तराई इलाके की विधानसभा सीटों के मतदाता लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों का भविष्य तय करते हैं। इस संसदीय सीट पर ग्रामीण आबादी 63.11% है। जबकि शहरी आबादी 36.89 फ़ीसदी के करीब है। इन में  8% अनुसूचित जाति 5.17 फ़ीसदी अनुसूचित जनजाति की आबादी है। आईने में 15 से 18 फ़ीसदी  राजपूत और ब्राह्मण हैं जबकि 17 से 18 फीसदी लगभग ओबीसी की आबादी है। वहीं 15 फ़ीसदी के करीब मुस्लिम आबादी अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेगी।

जो जीता वही सिकंदर

इस सीट को लेकर एक यह भी दावा है कि यहां से जिस पार्टी का प्रत्याशी जीता है केंद्र में इस दल की सरकार बनी है। कुमाऊं में भाजपा प्रत्याशी मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं। टिकट फाइनल होने के बाद से ही अजय भट्ट तूफानी चुनाव प्रचार कर रहे हैं और उनके समर्थन में स्टार प्रचारक भी चुनाव मैदान में उतर चुके हैं। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी को स्टार प्रचारकों का इंतजार है। हालांकि 13 अप्रैल को कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी की चुनावी रैली कुमाऊं में होनी है लेकिन उसी दिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुनावी रैली भी कुमाऊं मंडल में प्रस्तावित है।

इस सीट की भौगोलिक स्थिति पर नजर डालें तो तराई, भाबर और पर्वतीय हिस्सों में यह संसदीय क्षेत्र बंटा हुआ है। यहां पर्वतीय मूल के साथ ही पूर्वांचल,पश्चिम उत्तर प्रदेश और सिख समुदाय के लोग बहुतायत आते हैं तो मुस्लिमों की संख्या भी अच्छी खासी है। लगभग 70% ग्रामीण और 30% नगरीय क्षेत्र है। हल्द्वानी व रुद्रपुर में मलिन बस्तियां भी शामिल है जबकि जातीय समीकरण के इतिहास से यहां लगभग 27 प्रतिशत क्षत्रिय 17% ब्राह्मण और 16% अल्पसंख्यक हैं।

इन के साथ ही 16.8 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 5.17% अनुसूचित जनजातियों के साथ ही अन्य जातियों के लोग भी शामिल हैं। बात करें प्रत्याशियों की तो नैनीताल लोग उधम सिंह नगर लोकसभा क्षेत्र से दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरे वर्तमान सांसद अजय भट्ट केंद्रीय रक्षा व पर्यटन राज्य मंत्री हैं। वे रानीखेत सीट से विधायक रहने के साथ ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। क्षेत्र में उनकी सक्रिय भागीदारी भी रहती है।

कांग्रेस प्रत्याशी प्रकाश जोशी संगठन के रणनीतिकार रहे हैं। पूर्व में राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं अन्य राज्यों में चुनाव प्रभारी भी रहे हैं। यहां 14 विधानसभा क्षेत्र में से 8 सीटें भाजपा के पास हैं तीन नगर निगम हैं और तीनों पर भाजपा का कब्जा है। जिला पंचायत अध्यक्ष भी भाजपा के ही हैं और 11 ब्लाक प्रमुख भी भाजपा के ही हैं। इस सीट पर कांग्रेस दलीय स्थिति में भाजपा के मुकाबले कमतर है। 14 में से कुल छह विधायक कांग्रेस के हैं। दो ब्लॉक प्रमुख नगर पालिका व नगर पंचायत में 6 पालिका अध्यक्ष कांग्रेस के हैं।

5. अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा क्षेत्र

अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा सीट का अलग ही मिजाज है। चीन-नेपाल के साथ ही गढ़वाल सीमा से सटी चार जिलों में फैली यह संसदीय सीट काली, गोरी पूर्वी व पश्चिमी रामगंगा, कोसी नदियों वाले क्षेत्र में हिमालय का भूभाग भी शामिल है। इस लोकसभा सीट में सबसे कम 7 प्रत्याशी इस बार चुनाव मैदान में है। कांग्रेस ने जहां पुराने चेहरे पर ही दांव लगाते हुए पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा को चुनाव मैदान में उतारा है तो वहीं भाजपा ने भी सिटिंग एमपी अजय टम्टा पर ही खम ठोका है। लोकसभा सीट पर महिला और युवा फैक्टर काफी अहम है इन दोनों वर्गों का रुझान जिस दल की तरफ होगा उसी की जीत तय मानी जाती है।

अल्मोड़ा लोकसभा क्षेत्र की 14 में से 6 विधानसभा ऐसी हैं जहां पुरुषों के मुकाबले महिला वोटरों की संख्या अधिक है। इस लोकसभा सीट का परिसीमन 1987 में हुआ था। वर्ष 2009 से यह लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। यह सीट ठाकुर बाहुल्य है और ब्राह्मण, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के मतदाताओं का आंकड़ा लगभग बराबर है। यहां से भाजपा-कांग्रेस के साथ ही बसपा, उत्ताखंड क्रांति दल, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, बहुजन मुक्ति पार्टी और उत्तराखंड पीपुल्स पार्टी ने अपने प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे हैं।

इस सीट पर 90% आबादी ग्रामीण है जबकि सिर्फ 10% मतदाता ही शहरों में निवास करते हैं। यहां दुर्गम क्षेत्रों तक राजनीतिक दलों को पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है क्योंकि चार जिलों के 5000 से अधिक गांवों तक पहुंचना प्रत्याशियों के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा है। उनके समर्थक ही पोस्टर बैनर के जरिए मतदाताओं तक पहुंचेंगे। इनमें 55% राजपूत 23% ब्राह्मण और 22% एससी एसटी वोटर हैं।


 

 

 

 

 
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