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दलितों ने आरक्षण पर दिखाई रणनीति, फिर आदिवासी भाजपा के साथ क्यों रहे?.

 
  • Aditya Kumar
  • 12 Jun 2024
  • 1228
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लेखक: दीपांकर गुप्ता

इस बार लोकसभा चुनावों में दलितों यानी अनुसूचित जातियों (एससी) ने भाजपा के खिलाफ मतदान किया। उन्हें डर था कि फिर एनडीए सरकार बनी तो वह आरक्षण खत्म कर देगी। लेकिन आदिवासियों यानी अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के मामले में ऐसा नहीं है। चुनाव नतीजों को देखते हुए ऐसा लगता है कि दलित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा न केवल आम बल्कि खास सीटों पर भी भाजपा एनडीए उम्मीदवारों के खिलाफ वोट किया। उनमें भाजपा के खिलाफ ऐसी भगदड़ देखी गई जैसे फायर अलार्म बज गया हो।

वैसे तो चुनावी खेल के ठीक से शुरू होने से पहले ही यह सब शुरू हो गया था, लेकिन आदिवासी मतदाता भाजपा के साथ मजबूती से टिके रहे। यह हैरान करने वाली बात है कि उन्होंने आरक्षण खत्म करने की आशंका को सिरे से नजरअंदाज कर दिया। आखिरकार, अगर यह आरक्षण हटाए दिए जाने का खामियाजा तो आदिवासियों को भी उतना ही भुगतना होगा जितना आदिवासियों को। बावजूद इसके एनडीए ने उन सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया जहां आदिवासी मतदाताओं का औसत, राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है ।

यूपी लोकसभा के नतीजों से साफ पता चलता है कि अनुसूचित जातियों ने एनडीए का साथ छोड़ दिया। भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने यूपी की 22 सीटों में से 17 सीटें खो दीं, जहां अनुसूचित जातियों की आबादी 20% से ज्यादा है। इन झटकों ने भाजपा की जान तो नहीं ली, लेकिन गंभीर रूप से चोटिल कर दिया। इस चोट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा उम्मीदवार अयोध्या में भी हार गए जहां भव्य राम मंदिर का निर्माण हुआ और इस कारण वहां का कायाकल्प हो गया। भाजपा विधानसभा चुनावों में अयोध्या में जीती थी।

राष्ट्रीय औसत से ज्यादा आदिवासी आबादी वाले छह प्रमुख राज्यों में एनडीए के प्रदर्शन से इसकी तुलना करते हैं। एनडीए ने इन सभी राज्यों में शानदार जीत हासिल की - मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, ओडिशा, झारखंड और त्रिपुरा। झारखंड में एनडीए का सूपड़ा साफ हो सकता था, लेकिन सीएम हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद विपक्षी खेमे के पक्ष में सहानुभूति की लहर नहीं उठी।

ऐसी तुलना करने पर चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं। इन बातों से हमें विचलित करने वाले निष्कर्ष मिलते हैं कि भले ही आरक्षण का लाभ एससी और एसटी, दोनों को मिलता है, लेकिन उनकी दुनिया एक जैसी नहीं है। इसका पहला कारण जो तुरंत ध्यान में आता है वह यह है कि एसटी के पास एससी की तरह बाबासाहेब अंबेडकर जैसा कोई राष्ट्रीय नायक नहीं है। आंबेडकर एक ऐसी महान शख्सिय का नाम है जिन्होंने संविधान बनाने वाली टीम का आगे से साहसपूर्वक नेतृत्व किया।

फिर भी, इससे यह पूरी तरह साफ नहीं होता है कि आरक्षण समाप्त करने की आशंका जोर पकड़ने पर एसटी भी एससी की तरह बेचैन क्यों नहीं हुए। यह भी बिल्कुल सच है कि एसटी भी गरीब हैं। वे भी ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, लेकिन उनका सामाजिक पिछड़ापन 'ओछे व्यवसायों' से नहीं बल्कि भौगोलिक दूरी से आता है।

आज भी, लगभग 80% अनुसूचित जनजातियां प्राथमिक क्षेत्र (जैसे कृषि, वानिकी और मछली पकड़ने जैसे व्यवसायों) में हैं। आंकड़ों की बात करें तो आम आबादी के मुकाबले 53% से ज्यादा आदिवासी आबादी इन व्यवसायों में हैं। वास्तव में, आधुनिक युग से पहले के भारत में आदिवासी शासक हुआ करते थे। मानवविज्ञानी और गांधीवादी कार्यकर्ता एनके बोस के अनुसार, उन्हें क्षत्रिय माना जाता था। उनमें से कुछ आज भी मौजूद हैं और कोई भी उन पर उंगली नहीं उठाता है।

फिर मुंडा, ताना भगत और त्रिपुरी जैसी जनजातियां हैं, जिनका हिंदू धर्म में प्रवेश भक्ति आंदोलन के माध्यम से हुआ था। उन्हें पड़ोसी हिंदू कभी कमतर नहीं मानते थे जबकि पहाड़ी भुइयां जैसे कुछ जातियों को सम्मानित दर्जा प्राप्त था। यह भी दावा किया जाता है कि ओडिशा के जगन्नाथ पंथ का अतीत भी आदिवासियों से जुड़ा है। अखिल आदिवासी सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष ने 1973 में दावा किया था कि कई हिंदू देवता वास्तव में संथाली हैं।

पश्चिमी ओडिशा के हिंदू मिजाज वाले गोंडों को न केवल 'स्वच्छ' जाति माना जाता है, बल्कि इसके अलावा भील जैसे आदिवासी भी मेवाड़ और कुशलगढ़ राजसी राजचिह्नों में दिखाई देते हैं, जहां वे राजपूतों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। सबसे प्रसिद्ध भील राणा पुंजा हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में शक्तिशाली महाराणा प्रताप के साथ घोड़े पर सवार होकर लड़ाई लड़ी थी।

अनुसूचित जनजातियों की ये ऐतिहासिक विशेषताएं ही वो वजह हैं कि आरक्षण के डर के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अनुसूचित जातियों जैसी नहीं रही। आदिवासियों के विपरीत, दलित हमेशा से हिंदू समाज के हिस्सा रहे हैं और तथाकथित 'छोटे' और 'गंदे' व्यवसायों के लिए अभिशप्त रहे। नतीजतन, अनुसूचित जातियों के लिए सम्मान का मार्ग मुख्य रूप से शिक्षा और नौकरी पाकर समाज के ऊपरी पायदान पर पहुंचना रहा। यही वजह है कि वो आरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा सतर्क हैं।

विशेषज्ञों के बीच इस बात पर भी आम सहमति है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों के बीच इस मूल अंतर के कारण ही वे अपनी एक जैसी कठिनाइयों के बावजूद अभी तक एक साझा नेतृत्व नहीं बना पाए हैं। फिर भी, विडंबना यह है कि भले ही उन्हें व्यापक हिंदू समाज अनुसूचित जातियों की तरह कमतर नहीं आंकता है। यह अलग बात है कि शिक्षा, प्रतिनिधित्व और स्थिर रोजगार जैसे कई विकासात्मक सूचकांकों पर अनुसूचित जनजातियां ज्यादी पिछड़ी हुई हैं।

'मुख्यधारा' की अर्थव्यवस्था और राजनीति से स्थानीय दूरी आदिवासियों को काफी घाटे में रखती है। इसके विपरीत, दलित व्यापक समाज के साथ दैनिक संपर्क में हैं। इस कारण दलितों ने आदिवासियों की तुलना में सत्ता समीकरण को बेहतर तरीके से साधना सीख लिया है। आरक्षण अगर 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों को इस हद तक प्रभावित नहीं करता, तो हम एससी और एसटी के बीच के अंतरों को नजरअंदाज कर देते। बाहर से देखने पर वो दोनों गरीब लगते हैं, लेकिन लियो टॉल्स्टॉय के शब्दों में कहें तो 'सभी अमीर समुदाय एक जैसे हैं, लेकिन प्रत्येक गरीब समुदाय अपने-अपने तरीके से गरीब है।'

लेखक समाजशास्त्री हैं।

 

 

 
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