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जंगल की आग की तरह सुलग रहे सवाल, क्या ऐसे ही जलती रहेगी देवभूमि?.

 
  • Vivek Mishra
  • 20 May 2024
  • 1086
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देहरादून: चिपको आंदोलन वाली धरती इन दिनों भयावह आग का सामना कर रही है। उत्तराखंड के जंगल इन दिनों आग की लपटों से घिरे पड़े हैं। आग का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। आग पर काबू करने को लेकर सारे सरकारी दावे नाकाम दिखाई दे रहे हैं। पूरे राज्य पर आग के असर के बारे में महेश पाण्डेय जानकारी दे रहे हैं।

नवंबर से ही लग रही थी आग

उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग से पैदा हुई आपदा के कारण राज्य के पहाड़ी इलाकों को बेहद डरावने हालात से गुज़रना पड़ रहा है। बीते साल नवंबर से ही जंगलों में जहां-तहां आग की घटनाएं सामने आती रही हैं। प्रशासन ने इससे होने वाले नुकसान को सिर्फ पेड़-पौधों तक ही सीमित रखा है, लेकिन जी. बी. पंत हिमालयी संस्थान के का मनाना है कि नुकसान का आकलन जंगलों के पूरे इकोसिस्टम के हिसाब से किया जाना चाहिए।

ऐसे फैलती है जंगलों की आग

ज्यादातर मामलों में जंगलों की आग तलहटी (निचला हिस्सा) से चोटी की ओर फैलती है। इसे धराग्नि (Ground Fire) कहते हैं। धराग्नि पर काबू पाना बेहद मुश्किल होता है। आग से जंगल में मौजूद जल सोखने वाले पेड़ नष्ट हो जाते हैं। साथ ही जल्दी आग पकड़ने वाले पेड़ अपना असर दिखाते हैं। पहाड़ी जंगलों में लगने वाली आग का सबसे बड़ा कारण चीड़ के पेड़ों को ही माना जाता है। यह जमीन को न सिर्फ सूखा बनाते हैं, बल्कि इस पेड़ की जल्दी जलने वाली सूखी पत्तियां (जिन्हें स्थानीय बोली में पिरूल कहा जाता है) भारी संख्या में गिरकर जमीन पर इकट्ठा हो जाती हैं। थोड़ी-सी चिंगारी मिलने पर ये तेजी से बहुत बड़े वन क्षेत्र को अपनी जद में ले लेती है। हालांकि, यह पेड़ों का ज्यादा नुकसान नहीं करती, लेकिन जमीन और मिट्टी के अंदर बिल बनाकर रहने वाले जीवों का इससे काफी नुकसान होता है।
 

ऐसे पहुंचता है नुकसान

जंगल में आग से धरती की नमी और पानी सोखने की क्षमता कम हो जाती है। फिर जब भी बारिश होती है तो सतह की मिट्टी नदियों में बह जाती है। इससे धरती की उपजाऊ क्षमता में कमी आती है। यही नहीं इससे प्रजातियों के कुदरती प्रजनन की संभावना कम हो जाती है। यह आग मिट्टी के अंदर मौजूद जंतुओं, अति सूक्ष्‍म जीवों और फंगस आदि को पूरी तरह से नष्ट कर देती है। ये चीजें कुदरती तरीके से डेड ऑर्गेनिक मैटर को दोबारा पोषक तत्वों और गैस में बदलने का अहम काम करते हैं। इसके अलावा, यह आग जंगल को सुंदर बनाने वाले वन्यजीवों, पशु-पक्षियों, अलग-अलग तरह के फूल-पौधों और औषधीय जड़ी-बूटियों को भी राख में बदल देती है।
 

चीड़ के पेड़ करते हैं आग में घी का काम

उत्तराखंड के पहाड़ों के जंगल में 16 फीसदी इलाका चीड़ के पेड़ों का है। यहां लकड़ी के लालच में अंग्रेजों ने चीड़ और देवदार के जंगल लगाए थे। एक आकलन के मुताबिक, 1 हेक्टेयर में मौजूद चीड़ के पेड़ों से सालभर में 7 टन सूखी पत्तियों का ढेर फैलता है। उत्तराखंड में अगर 8000 वर्ग किलोमीटर में चीड़ वन फैले हैं तो अनुमान लगाया जा सकता है कि बाकी जंगल किस खौफनाक ढेर पर खड़ा है।

लीसा भी बढ़ाता है परेशानी

गर्मी के सीजन में चीड़ के जंगलों में लीसा निकालने का काम भी शुरू होता। लीसा जो उत्तराखंड के चीड़ के जंगलों से मिलने वाली एक अहम वन उपज है। इससे तारपीन का तेल निकलता है, जिसका इस्तेमाल कागज, साबुन, और पेंट बनाने में किया जाता है। लीसा ग्रामीण इकोनॉमी और रोजगार का अहम जरिया है। यह इतना ज्वलनशील होता है कि उसमें लगी आग पर काबू पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इस बार की आग में 4 लीसा मजदूर आग की भेंट चढ़ चुके हैं। आग से लीसा डिपो की सुरक्षा को लेकर भी बड़ा खतरा पैदा होता है। उत्तराखंड वन विभाग बड़े पैमाने पर लीसा का उत्पादन करता है। लीसा से सरकार को अच्छा-खासा रेवेन्यू मिलता है।

कम बारिश ने सुखाए जंगल

प्री-मॉनसून सीजन में वेस्टर्न डिस्टर्बंस की घटनाओं में आई कमी से बर्फबारी कम हुई। बारिश भी न के बराबर हुई। पहले डिस्टर्बंस की 15-20 घटनाएं होती थीं, लेकिन इस बार सिर्फ 7 से 8 बार ही हुई। इसके कारण जंगलों की नमी गायब हो गई। वे सूख गए। पिछले साल नवंबर के महीने से ही जंगलों में आग की खबरें आने लगीं। भयानक आग की वजह से हवा की क्वॉलिटी बिगड़ी। अब इस बात को लेकर भी वैज्ञानिक डरे हैं कि कहीं आग के कारण हवा में फैले हुए ज्यादा कार्बन कण ग्लेशियरों पर न जम जाएं। अगर ऐसा हुआ तो ग्लेशियर के पिघलने की आशंका बढ़ जाएगी। इससे चमोली और केदारनाथ जैसे हादसे भी हो सकते हैं।

बादलों को ट्रैवल करवाकर होगी बारिश

आग से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए दुनिया की सबसे नई तकनीक वेदर जनरेटर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके तहत बिना किसी नुकसान के आयन जनरेटर मॉड्यूल स्थापित कर कई किलोमीटर दूर से बादलों को ट्रैवल करवाकर टारगेट एरिया में बारिश करवाई जा सकती है। इस टेक्नोलॉजी से केवल फॉरेस्ट फायर में ही मदद नहीं मिलेगी, बल्कि बादल फटने की स्थिति को भी टाला जा सकता है। इस टेक्नॉलजी के जरिए किसी जगह पर घने बादल होने की स्थिति में वहां से बादलों को हटाया भी जा सकता है। बादल फटने की घटना को टाला भी जा सकता है। वायुमंडल में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक चर्ज़्ड पार्टिकल छोड़ने के बाद आसपास के बादलों को टारगेट एरिया पर ले जाकर एक तय जगह पर बारिश करवाकर प्रदूषण नियंत्रण समेत कई दूसरी समस्याओं को भी खत्म किया जा सकता है।

फिलहाल ठंडे बस्ते में है उपाय

2021 में आपदा प्रबंधन विभाग ने आपदा से जुड़े अलग-अलग संस्थानों के 8 विशेषज्ञों की एक टीम बनाकर लीसा टेक्नोलॉजी पर चर्चा की थी। इसका एक कामयाब प्रदर्शन भी किया गया था, लेकिन इस तकनीक को यहां जंगलों की आग बुझाने में प्रयोग किया जाता उससे पहले ही इसको लेकर राज्य के एक मंत्री ने ऐसा बयान दे डाला कि उनकी खिल्ली उड़ गई। इस अच्छी-खासी तकनीक को अपनाने की सारी कवायदों पर पानी फिर गया। नतीजा यह हुआ कि यह फाइल फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दी गई।
 

इस ऑप्शन में है दिक्कत

आग की भयावह स्थिति देखते हुए मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों बयान दिया कि क्लाउड सीडिंग नाम की कृत्रिम बारिश टेक्नोलॉजी पर विचार किया जा रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार क्लाउड सीडिंग का कॉन्सेप्ट यहां के पहाड़ों के लिए एक जहरीली सोच है। क्लाउड सीडिंग के जरिए बारिश करवाने की प्रक्रिया में केमिकल छिड़काव का इस्तेमाल किया जाता है। इसे लेकर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोग भी सवाल उठा रहे हैं। इसके लिए प्रयोग में लाए जाने वाले केमिकल इतने जहरीले होते हैं कि जंगली जीव ही नहीं मानवता पर भी गंभीर खतरा हो सकता है। नदियों को भी नुकसान हो सकता है। गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में भूविज्ञान के प्रफेसर एम. पी. एस बिष्ट का कहना है कि पहाड़ों के स्टेप स्लोप और यहां के वातावरण के लिए यह कितना खतरनाक साबित हो सकता है, इसका भान दुबई की हाल में हुई परिस्थितियों से किया जा सकता है।

 

 
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