देहरादून: उत्तराखंड के रास्ते कैलाश दर्शन को जमीन पर उतारने में सफलता मिल गई है। तीर्थयात्रियों को भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत के दर्शन का सौभाग्य आसानी से मिल रहा है। इस सुविधा को दिए जाने के बाद कैलाश दर्शन यात्रा के लिए तीर्थयात्रियों का पहला जत्था बुधवार को रवाना हुआ। पिथौरागढ़ के नैनी सैनी हवाई अड्डे से उड़ान भरकर तीर्थयात्रियों का दल गुंजी पहुंचा। यहां से तीर्थयात्रियों का दल पुराने लिपुलेख तक 2.5 किलोमीटर का रास्ता तय करेंगे। लिपुलेख से तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित पवित्र कैलाश शिखर का दर्शन संभव हो जाएगा। कैलाश दर्शन भारतीय सीमा से ही हो सकेगा। यह पहली बार है कि इस तरह की तीर्थयात्रा की सुविधा तीर्थयात्रियों को दी जा रही है।
कोविड-19 प्रकोप के बाद 2020 में चीन ने लिपुलेख के रास्ते कैलाश-मानसरोवर यात्रा को निलंबित कर दिया था। इस मार्ग को अभी तक खोला नहीं गया है। वैकल्पिक व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार और उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने माउंट कैलाश दर्शन के लिए लिपुलेख को एक सुविधाजनक स्थान के रूप में विकसित किया है। पुराना लिपुलेख भारत-चीन सीमा के पास 17,500 फीट की ऊंचाई पर पिथौरागढ़ की सुंदर व्यास घाटी में बसा है।
लिपुलेख से पवित्र कैलाश पर्वत के लुभावने दृश्य देखे जा सकते हैं। पांच तीर्थयात्रियों का पहला जत्था माउंट कैलाश और ओम पर्वत दर्शन यात्रा पर रवाना हुआ है। यह दल चार दिनों तक गुंजी में रहेगा। पिथौरागढ़ के जिला पर्यटन अधिकारी कीर्ति आर्य ने कहा कि पहले जत्थे में तीर्थयात्री भोपाल, चंडीगढ़ और राजस्थान से हैं। उन्होंने कहा कि शेष तीन जत्थों के 4, 7 और 10 अक्टूबर को पहुंचने की उम्मीद है।
कीर्ति आर्य ने कहा कि यात्रा सेवाओं को जारी रखने का निर्णय तीर्थयात्रियों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस पुराने लिपुलेख के चुनौतीपूर्ण मार्ग को पार करने में तीर्थयात्रियों की सहायता करेगी। कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) के महाप्रबंधक विजय शुक्ला ने बताया कि यात्रा के लिए निगम को नोडल एजेंसी बनाया गया है। निगम ने तीर्थयात्रियों के लिए गुंजी में आवास और जीप की व्यवस्था की है।