देहरादून: गुरु द्रोणाचार्य की नगरी की धड़कन, एशिया का अनोखा षटकोणीय घंटाघर और देहरादून की शान घंटाघर भी चोरों के हाथों से बच नहीं पाया है। चोर भी इस कदर बेखौफ हो गए हैं कि नगर कोतवाली और धारा चौकी से कुछ ही दूरी पर स्थित घंटाघर से कीमती सामान पर हाथ साफ कर दिया। चोरी का पता भी तब चला जब कई दिनों से घंटाघर पर लगी घड़ियां बंद होने की जानकारी नगर निगम को मिली। घंटाघर से सामान चोरी होना आश्चर्यनजक है क्योंकि चंद कदमों की दूरी पर धारा चौकी स्थित है तो वहीं कुछ दूरी पर नगर कोतवाली भी है। सबसे बड़ी बात कि घंटाघर के साथ ही पुलिस पिकेट भी है और दिनरात दो-तीन पुलिसकर्मी यहां तैनात रहते हैं। तब भी चोरों ने कीमती सामान पर हाथ साफ कर दिया। दिन के साथ ही रात के समय भी घंटाघर के आसपास चहल-पहल रहती है।
नगर आयुक्त गौरव कुमार के अनुसार, उन्हें घंटाघर की सुइयां कई दिनों से बंद होने की सूचना मिली थी तो उन्होंने अधिकारियों को घड़ी चेक करने के लिए निर्देश दिए। देहरादून नगर निगम के अधिकारियों ने जब मौके पर जाकर जांच की तो पता चला कि फव्वारे के लिए लगाई गई कीमती नोजब और घंटाघर को रोशन करने वाली लाइटों की केबल सहित अन्य कीमती सामान गायब है। उन्होंने बताया कि चोरों ने तार, सामान और पैनल चोरी किया है। घंटाघर की घड़ी बंद होने के साथ ही इसके सौंदर्यीकरण के लिए लगाई गई लाइटें भी बंद पड़ी हुई है। यहां पर चोरी का किया पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी घंटाघर से दो बार तार और पैनल चोरी हो चुका है।
देहरादून शहर के बीचो-बीच यह घंटाघर स्थित है। कई दशकों से सीना ताने खड़ा यह घंटाघर जहां राज्य आंदोलन के साथ ही कोविड में सुनसान पड़ी सड़कों का गवाह रहा है। शहर में होने वाले धार्मिक आयोजनों से लेकर तमाम रैलियों, धरने-प्रदर्शनों का मूक दर्शक रहा है घंटाघर। देहरादून की धड़कन कहे जाने वाले घंटाघर की सुइयां चलती रहती हैं और इसके घंटे की आवाज से कई मीटर दूर तक लोगों को समय का पता चल जाता है। देहरादून की शान यह घंटाघर यहां पर बनना भी बेहद मुश्किल भरा था। जानकारों के मुताबिक, 1948 में क्लॉक टावर स्थापित करना बेहद चुनौतियों भरा काम था क्योंकि आपसी प्रतिद्वंद्विता के चलते शहर के कई प्रतिष्ठित लोग किसी एक रईस के द्वारा इस क्लॉक टावर के निर्माण के पक्ष में नहीं थे। क्लॉक टावर के निर्माण में भूमि के स्वामित्व और ठेकेदार की कोटेशन, तांगा चालकों का विवाद भी रुकावट बना।
देहरादून के तत्कालीन न्यायाधीश और शहर के रईस बलवीर सिंह के निधन के बाद उनकी स्मृति में उनके बेटे आनंद सिंह ने यह क्लॉक टावर बनवाया था। तत्कालीन सिटी बोर्ड के अध्यक्ष आनंद स्वरूप गर्ग ने बलवीर क्लॉक टावर निर्माण का प्रस्ताव सिटी बोर्ड को दिया था। जब इस पर विवाद नहीं तो तब आनंद स्वरूप गर्ग ने आनंद सिंह को इन सभी विवादों को सुलझाने के लिए तत्कालीन राज्यपाल सरोजिनी नायडू से क्लॉक टावर के शिलान्यास करवाने को कहा।
भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने 24 जुलाई, 1948 को बालवीर क्लॉक टावर का शिलान्यास किया और फिर घंटाघर ने ऊंचाइयों की ओर बढ़ना शुरू किया। घंटाघर की वास्तुकला भी अलग ही है। शुरू में इसका डिजाइन चौकोर था लेकिन बाद में इसे षट्कोणीय कर दिया गया। घंटाघर के शीर्ष पर छह घड़ियां लगाई गई हैं। उस दौर में स्विट्जरलैंड से भारी भरकम मशीनों के साथ यह घड़ियां भी मंगवाई गई थी। इससे ही इन घड़ियों की महत्ता समझी जा सकती है। 1948 में इस क्लॉक टावर का निर्माण शुरू हुआ था और 1953 में यह बनकर तैयार हुआ जिसका उद्घाटन तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किया था।
इस घंटाघर के साथ एक विशालकाय पीपल का पेड़ भी खड़ा है जो दूनवासियों की रग-रग में बसा हुआ है। इस पेड़ की ठंडी छांव जहां गर्मियों में कई लोगों को राहत देती है तो वहीं बरसात में भी यह पेड़ कुछ देर के लिए लोगों का सहारा बन जाता है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह घंटाघर और पीपल का पेड़ एक दूसरे के पूरक हैं। इस पीपल के पेड़ को घंटाघर के शिलान्यास के समय भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने रोपा था और आज यह भी देहरादून की शान बना हुआ है। वर्ष 2012 में इस वृक्ष को हटाने की मुहिम शुरू हुई थी लेकिन दूनवासियों ने पेड़ को हटाने की बजाय धरोहर के रूप में संरक्षित करने के लिए समर्थन किया। देहरादून के लोगों का कहना था कि घंटाघर के स्तंभ को धरोहर कहा जा सकता है तो उससे दो दशक पहले स्थापित किया गया पीपल का पेड़ धरोहर क्यों नहीं हो सकता। यहां तक कि लोगों ने पीपल के वृक्ष को देवता का स्थान देते हुए यहां से नहीं हटाने की मांग भी की थी।