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उत्तराखंड की सरस्वती बनीं दुनिया की सबसे कम उम्र की डोनर, माता-पिता ने भारी मन से किया ढाई दिन की बेटी का शव दान.

 
  • Shubham Sehgal
  • 13 Dec 2024
  • 680
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देहरादून: उत्तराखंड में ढाई दिन की सरस्वती का नाम दुनिया की सबसे छोटी देहदाता के रूप में दर्ज हो गया है। बच्ची जन्म से ही हृदय रोग से पीड़ित थी और पैदा होने के मात्र ढाई दिन में ही उसकी मौत हो गई। ऐसे में उसके माता-पिता ने बच्ची का देहदान कर एक मिसाल कायम की है। बच्ची का शव म्यूजियम में सुरक्षित तो रखा जाएगा लेकिन अब उसके माता-पिता कभी भी उसे नहीं देख पाएंगे।

ढाई दिन की बच्ची सरस्वती के देहदान की खबर सुर्खियों में है। हर कोई इस बच्ची की असमय मौत और देहदान की खबर से हैरान है। उत्तराखंड के इस युवा दंपति ने अपनी बच्ची का देहदान कर एक बड़ी मिसाल पेश की है।

हरिद्वार के ज्वालापुर स्थित पुरुषोत्तम नगर निवासी 30 वर्षीय राममेहर और उनकी पत्नी मगन देवी ने मेडिकल एजुकेशन के लिए अपनी ढाई दिन की बच्ची का शव दान दिया है। दून मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग को बच्ची का शव दान में दिया गया है।

डॉक्टर के अनुसार मगन देवी को लेबर पेन की वजह से दून अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां रविवार 8 दिसंबर को दोपहर के समय सिजेरियन से उन्होंने बच्ची को जन्म दिया। इस दंपति की यह दूसरी औलाद थी। अभी यह दंपति बच्ची के होने की खुशियां मना ही रहा था कि बच्ची को हृदय संबंधी रोग होने की खबर ने उन्हें हिला कर रख दिया। यह बच्ची NICU वार्ड में भर्ती थी लेकिन 10 दिसंबर को उसकी मौत हो गई।

बच्ची की मौत से दंपती सदमे में थे। इसी दौरान राम मेहर ने अपनी बच्ची की मौत की जानकारी अपने पारिवारिक डॉक्टर जितेंद्र सैनी को दी। ढाई दिन की बच्ची के हार्ट रिलेटेड प्रॉब्लम की वजह से मौत होने की बात पर डॉक्टर जितेंद्र सैनी ने बच्ची के शरीर को दान देने की राय दी।

अपनी ढाई दिन की बच्ची के देहदान की खबर से दंपती कुछ कसमसाए लेकिन डॉक्टर सैनी की प्रेरणा से उन्होंने दधिचि देहदान समिति के पदाधिकारियों से संपर्क कर दून हॉस्पिटल के एनाटॉमी विभाग को शव दान में दे दिया।

जन्‍म से ही वेंटिलेटर पर थी

दून अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर अशोक कुमार के अनुसार सरस्वती बर्थ एसफिक्सिया नाम की बीमारी से पीड़ित थी। जन्म के बाद से वेंटिलेटर सपोर्ट पर थी। काफी प्रयासों के बाद भी बच्ची को बचाया नहीं जा सका। मंगलवार देर रात करीब 2:34 बजे बच्ची ने आखिरी सांस ली।। यह बीमारी बच्चों में जन्म से होती है। इसमें बच्चों के मस्तिष्क तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती है और बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होती है। जिससे बच्चों के शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है और एसिड का स्तर बढ़ जाता है।

दून मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग के अध्यक्ष डॉ एमके पंत ने बताया कि सरस्वती कश्यप कॉलेज संग्रहालय में रखा जाएगा। शव को लंबे समय तक संरक्षित रखने के लिए उसे पर थर्मालीन तरल लेप लगाया गया है।

इस समय उस मां की स्थिति का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है जिसने अपनी ढाई दिन की बच्ची का शवदान मेडिकल शिक्षा के लिए दान कर दिया। एक मां की ममता बच्ची को खोने के दर्द से गुजर रही है लेकिन शिक्षा की प्रेरणा ने मां की ममता पर विजय पा ली।

मेडिकल एजुकेशन में होगी मदद

हालांकि संग्रहालय में संरक्षित शव मेडिकल एजुकेशन के लिए तो काम आएगा लेकिन अब बच्ची के शव के दर्शन माता-पिता नहीं कर पाएंगे। एनाटॉमी विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर एमके पंत के अनुसार संग्रहालय में रखे जाने वाले शवों के दर्शन के लिए उनके परिवार को अनुमति नहीं दी जाती है क्योंकि इससे परिवार के लोग मानसिक पीड़ा में जा सकते हैं।

देहदान से पहले नामकरण किया गया

विदित हो कि देहदान की दुनिया में अब तक सबसे कम उम्र की देहदान का यह पहले मामला है। इससे पहले निम्नतम 7 दिन के बच्चे का देहदान किया गया था। यहां ढाई दिन की बच्ची के देहदान से पहले उसका नाम सरस्वती रखा गया। अब यह सरस्वती नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है।

इसलिए नाम रखा सरस्‍वती

एनाटॉमी विभाग के डॉ राजेश मौर्य का कहना है कि सरस्वती ज्ञान की देवी हैं और यह बच्ची भी उनके माध्यम से छात्रों को शिशु की शारीरिक रचना सीखने में मदद करेगी। वहीं बच्ची की मां का कहना है कि हम बच्ची को ठीक महसूस कर पाते उससे पहले ही वह हमसे दूर चली गयी। उसका शरीर दान कर हम उसे अमर बना रहे हैं जो मेडिकल शिक्षा के उद्देश्य को पूरा करेगी। उनका कहना है कि शुरुआत में वे लोग झिझक रहे थे लेकिन बाद में उन्होंने एकमत होकर बच्ची का देहदान करने का फैसला लिया।

 

 

 

 
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