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चमोली एवलांच:5 मिनट में दो बार टूटा बर्फ का पहाड़, बनियान पहनकर नंगे पैर दौड़े लोग, रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी.

 
  • Shivani Azad
  • 03 Mar 2025
  • 992
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चमोली: उत्तराखंड के चमोली जिले के माणा गांव के पास भारी बर्फबारी के बीच एक कड़ाके की ठंड वाली सुबह थी। लगभग 10,500 फीट की ऊंचाई पर फंसे 23 लोगों को पता था कि वे मदद के लिए इंतजार नहीं कर सकते। शुक्रवार को भोर में जब हिमस्खलन उनके आश्रय पर गरज के साथ गिरा, तो उन्हें केवल अपनी बुद्धि और एक लोडर पर भरोसा करना था। केवल बनियान पहने, नंगे पैर बर्फ पर, वे मशीन का पीछा करते हुए भागे, जो बर्फ के बीच से एक नाजुक रास्ता बना रही थी।

मजदूरों के के पास भागने का एकमात्र मौका था, जो उन्हें एक ढहते हुए पहाड़ जैसा लग रहा था। दो घंटे तक बर्फ और तेज हवाओं के बीच, वे आगे बढ़ते रहे। उनके शरीर ठंड से सुन्न हो गए थे। इसके बाद भी जब तक वे लगभग 4 किलोमीटर दूर सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के शिविर तक नहीं पहुंच गए, रुके नहीं। जान बचाने की यह कहानी सुनाते हुए लोग उस समय में चले जाते हैं, जब उनके पास विकल्प बहुत कम थे।

लड्‌डू पंडित ने निकाला लोडर

जान बचाकर भागने वालों में 28 वर्षीय लड्डू कुमार पंडित भी थे। एवलांच के प्रभाव से चौंककर वह जाग गए। उन्हें पता था कि सोचने का समय नहीं है। वह अपने लोडिंग वाहन की ओर झपटे। इसका उपयोग आम तौर पर बर्फ और मलबे को हटाने के लिए किया जाता है। लड्‌डू ने उसे आगे बढ़ाया, सहज ज्ञान ने उसे नियंत्रित कर लिया। लड्‌डू कहते हैं कि ऐसा लग रहा था जैसे मौत हमारा पीछा कर रही थी।

लड्‌डू ने बताया कि हमें पहले से कहीं ज्यादा तेज भागना पड़ा। उसके पीछे उसके साथी भाग रहे थे। इनमें से कई उस समय भी नींद के आगोश में ही थे। इसके बाद भी वे जमी हुई सड़क पर भागे। उनके पैर बर्फ में धंस रहे थे, क्योंकि वे मशीन के ट्रैक को फॉलो कर रहे थे।

20 फीट ऊंचा था एवलांच

लड्‌डू पंडित ने बताया कि 100 मीटर क्षेत्र तक फैला और लगभग 20 फीट ऊपर उठा एवलांच उनके ठहरने के स्थान को तहस-नहस कर दिया था। इससे सामान या जूते इकट्ठा करने का समय नहीं मिला। बिहार के बचे हुए लोगों में से एक मुन्ना प्रसाद ने कहा कि कुछ लोग केवल बनियान पहने हुए थे। पंकू और अनिल शेड गिरने से घायल हो गए, इसलिए हमने उन्हें वाहन के अंदर रखा। हमारे फोरमैन सतीश, जिनका वजन एक क्विंटल से ज्यादा है, वह भी गाड़ी के साथ नहीं चल पाए। इसलिए वे भी गाड़ी में चढ़ गए।

मुन्ना ने कहा कि हममें से बाकी लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था। हम बिना रुके दौड़ते रहे। कभी-कभी सांस लेने के लिए तेज गति से चलते समय रुक जाते थे। इसके बाद फिर जान बचाने के लिए दौड़ने लगते थे। करीब 4 किलोमीटर तक हम मुश्किलों से लड़ते रहे। हम आखिरकार सुबह 9.15 बजे बीआरओ कैंप में पहुंच गए।

रास्ते से परिचित थे लोग

हादसे में फंसे लोगों का बचना केवल उनके भागने की गति पर निर्भर नहीं था, बल्कि वे यह जानते थे कि उन्हें कहां जाना है। धीरज, प्रसाद और किसान ने बद्रीनाथ क्षेत्र में दो साल तक काम किया था। वे वहां के रास्ते से परिचित थे। उनमें से एक ने कहा कि यही एकमात्र चीज थी, जिसने हमें पूरी तरह से घबराने से रोका। हमें ठीक से पता था कि किस दिशा में भागना है। डर तो था, लेकिन हमने कभी अपने फैसले पर दोबारा विचार नहीं किया।

शिविर में पहुंच कर ली सांस

एवलांच से निकल कर बीआरओ शिविर में पहुंचे तो इन लोगों की सांस में सांस आई। इसके बाद उन्हें थकावट महसूस हुई। ठंड लगना शुरू हुआ। कुछ लोग शिविर में पहुंचते ही गिर पड़े। उनके पैर बर्फ में जम गए थे। अन्य लोग एक साथ बैठ गए। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि वे इस आपदा से बच गए हैं। वहां से उन्हें ज्योतिर्मठ में सैन्य अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में कंबल और चिकित्सा देखभाल की गर्मी ने पहाड़ों की बहरी खामोशी की जगह ले ली।

बचकर लौटे एक व्यक्ति ने कहा कि केवल जब हम शिविर में पहुंचे, तब हमें आखिरकार सुरक्षित महसूस हुआ। जम्मू-कश्मीर के दिलेर सिंह ने अपने कंटेनर को हिमस्खलन में गिरते देखा था। उन्हें भी इस आपदा से बचना अभी भी अवास्तविक लगता है। वह कहते हैं कि मैं ज्योतिर्मठ मिलिट्री हॉस्पिटल में अपने सहयोगियों के साथ हूं, सुरक्षित। यह आश्चर्यजनक है।

दिलेर सिंह कहते हैं कि मेडिकल कर्मचारी हमारी देखभाल कर रहे हैं। जब मैं पीछे मुड़कर सोचता हूं कि हम किससे भागे थे तो मैं केवल अपने भाग्य को धन्यवाद दे सकता हूं। उस दिन हमारे साथ हमारा भाग्य भी था। इस कारण हम उस भयंकर हादसे से बचकर निकल पाए।

सीएम ने दी जानकारी

सीएम पुष्कर सिंह धामी ने रेस्क्यू ऑपरेशन के संबंध में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि चमोली जिले के माणा क्षेत्र में 28 फरवरी को हुए हिमस्खलन में फंसे श्रमिकों के लिए चलाया गया सर्च और रेस्क्यू अभियान पूरा हो चुका है। इस आपदा में कुल 54 श्रमिक फंसे थे, जिनमें से 46 को सुरक्षित निकाल लिया गया। दुर्भाग्यवश 8 श्रमिकों की मृत्यु हो गई। मुख्यमंत्री ने भविष्य में इस तरह के घटनाओं में नुकसान कम से कम हो इसके लिए हिमस्खलनों के निगरानी का तंत्र विकसित करने के निर्देश दिए हैं।

मुख्यमंत्री ने कहा कि रेस्क्यू ऑपरेशन में भारतीय सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, बीआरओ, पुलिस, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने अदम्य साहस और समर्पण का परिचय दिया। विपरीत परिस्थितियों में सर्च और रेस्क्यू अभियान चलाकर 46 जिंदगियां बचाई गईं। दुर्भाग्यवश 8 लोगों को नहीं बचा पाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह लगातार पूरे ऑपरेशन की जानकारी लेते रहे।

मुख्यमंत्री ने रेस्क्यू अभियान में सेना, आईटीबीपी, बीआरओ, राज्य आपदा प्रबंधन विभाग, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, जिला प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, वायु सेना, यूकाडा, अग्निशमन विभाग, खाद्य विभाग, बी०एस०एन०एल०, ऊर्जा, अग्निशमन विभाग द्वारा प्रदान की गई महत्वपूर्ण सेवाओं के लिए उनके योगदान की सराहना की है।मुख्यमंत्री ने कहा कि अस्पताल में भर्ती घायल श्रमिकों की चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। सरकार पूरी तरह प्रभावितों के साथ खड़ी है और हरसंभव सहायता प्रदान की जाएगी। मृतक श्रमिकों के पार्थिव शरीर उनके परिजनों को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की जा रही है।

 

 
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