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जाति जनगणना से आरक्षण सीमा 50% से अधिक न बढ़ाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का क्या होगा असर? हर बिंदु को समझें.

 
  • Kunal Kataria
  • 02 May 2025
  • 1078
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नई दिल्लीः केंद्र सरकार ने जाति जनगणना कराने का फैसला किया है। इससे आरक्षण के मामले में कुछ बदलाव हो सकते हैं, क्योंकि कोर्ट ने कहा है कि रिजर्वेशन को सही ठहराने के लिए सरकार को आंकड़े पेश करने होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में आरक्षण को लेकर एक सीमा तय की थी। तब से, आरक्षण को बढ़ाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। लेकिन कोर्ट इस मामले में अड़ा हुआ है।

1992 में इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए। तब से, कई राज्यों और केंद्र सरकार ने ऐसे कानून बनाए जिनमें आरक्षण 50% से ज्यादा था। लेकिन कोर्ट ने इन कानूनों को रद्द कर दिया। कोर्ट का कहना था कि आरक्षण की सीमा का पालन करना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सामाजिक पिछड़ेपन और शिक्षा, सरकारी नौकरियों आदि में कम प्रतिनिधित्व के आंकड़े होने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) को स्थानीय निकायों में आरक्षण देने में भी मदद की है। इसके साथ ही, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) को सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में भी आरक्षण दिया है।

पहले 1992 के मामले को समझते हैं

1992 के मामले में, सुप्रीम कोर्ट मंडल कमीशन की सिफारिशों पर विचार कर रहा था। मंडल कमीशन ने OBC को 27% आरक्षण देने की बात कही थी। कमीशन का अनुमान था कि देश में OBC की आबादी 52% है। कोर्ट ने OBC को आरक्षण देने की अनुमति दी, लेकिन कुछ शर्तों के साथ। कोर्ट ने कहा कि 'क्रीमी लेयर' को आरक्षण से बाहर रखा जाना चाहिए। क्रीमी लेयर का मतलब है, OBC में जो लोग अमीर हैं, उन्हें आरक्षण नहीं मिलेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि कुल आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन 'असाधारण' स्थितियों में आरक्षण 50% से ज्यादा हो सकता है। इस 50% में SC को 15%, ST को 7.5% और OBC को 27% आरक्षण शामिल था।

पांच जजों की बेंच ने 2006 में क्या दिया था फैसला?

2006 में, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 16(4A) और 16(4B) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर विचार किया। ये अनुच्छेद अनुसूचित जाति और जनजाति को प्रमोशन में आरक्षण देने से संबंधित थे। एम. नागराज बनाम भारत संघ मामले (2006) में पांच जजों की बेंच ने फैसला दिया। कोर्ट ने 50% की सीमा को दोहराया। क्रीमी लेयर के नियम को भी बरकरार रखा। कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य को यह साबित करना होगा कि आरक्षण क्यों जरूरी है। राज्य को 'पिछड़ेपन', 'प्रतिनिधित्व की कमी' और 'प्रशासनिक दक्षता' के बारे में बताना होगा। कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य ऐसा नहीं कर पाता है, तो अनुच्छेद 16 में समानता का अधिकार खत्म हो जाएगा।

2018 में, कोर्ट को यह तय करना था कि एम. नागराज के फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत है या नहीं। जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता के मामले में कोर्ट ने फैसला दिया कि SC/ST के प्रमोशन के मामले में, राज्य को उनका पिछड़ापन साबित करने की जरूरत नहीं है। लेकिन राज्य को यह बताना होगा कि SC/ST का प्रतिनिधित्व कम क्यों है?

आरक्षण के लाभों को बढ़ाने के प्रयासों को भी रोका

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लाभों को बढ़ाने के प्रयासों को भी रोका है। कोर्ट ने UPA सरकार के फैसले को रद्द कर दिया था। सरकार ने जाटों को OBC की लिस्ट में शामिल करने का फैसला किया था। यह फैसला बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान के कुछ जिलों के लिए था।

कोर्ट ने महाराष्ट्र के 2018 के कानून को भी रद्द कर दिया था। इस कानून में मराठों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। कोर्ट ने कहा कि इससे राज्य में कुल आरक्षण 50% से ज्यादा हो जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ केंद्र सरकार ही सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC) को परिभाषित कर सकती है। इसके बाद, संसद ने अनुच्छेद 342A में संशोधन किया. इससे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को SEBC की पहचान करने का अधिकार वापस मिल गया।
 

स्थानीय निकायों में आरक्षण देने के लिए नियम बताए

2021 के एक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकायों में आरक्षण देने के लिए नियम बताए। कोर्ट ने कहा कि राज्यों को तीन काम करने होंगे-पहला, एक आयोग बनाना होगा। दूसरा, OBC के पिछड़ेपन के बारे में आंकड़े जुटाने होंगे। तीसरा, यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी स्थानीय निकाय में कुल आरक्षण 50% से ज्यादा न हो। इस फैसले के बाद, कई राज्य सरकारों ने आयोग बनाए।

EWS आरक्षण 50% के नियम का अपवाद है

जाति आधारित आरक्षण से हटकर, केंद्र सरकार ने 2019 में संविधान (एक सौ तीसरा संशोधन) अधिनियम लाया। इस अधिनियम में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को 10% आरक्षण देने की बात कही गई थी। इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। जनहित अभियान बनाम भारत संघ मामले (2022) में पांच जजों की बेंच ने 3:2 के बहुमत से इस कानून को सही ठहराया। इसका मतलब है कि 50% की सीमा टूट गई, लेकिन कोर्ट ने कहा कि आर्थिक आधार पर आरक्षण देना संवैधानिक है।

EWS आरक्षण 50% के नियम का एक अपवाद है। तमिलनाडु का 69% आरक्षण दूसरा अपवाद है। तमिलनाडु ने यह आरक्षण कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में डालकर हासिल किया है। नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है। लेकिन अब यह नियम बदल गया है। अब नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। अन्य राज्य कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाएं अभी भी कोर्ट में लंबित हैं। इन कानूनों में आरक्षण 50% से ज्यादा है।

 

 
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