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किशोरों को प्यार की सजा देना सही नहीं, पश्चिम बंगाल के एक मामले ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान POCSO की ओर खींचा.

 
  • Kunal Kataria
  • 26 May 2025
  • 1220
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भारत में बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए साल 2012 में POCSO एक्ट लाया गया। इकॉनमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की ओर से 2019 में 60 देशों में कराए गए सर्वे के मुताबिक, बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के मामले में भारत का कानून दुनिया में सबसे अच्छा निकला- इंग्लैंड, स्वीडन और ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों से भी बेहतर। लेकिन, यह भी सच है कि देश में आज भी बच्चों का यौन शोषण बड़े पैमाने पर होता है। कानून के मुताबिक, 18 साल से कम उम्र वालों को बच्चा माना जाता है और उन्हें सहमति से सेक्स का अधिकार नहीं है। इस कारण कई समस्याएं भी खड़ी हो रही हैं।

कड़े प्रावधान: किशोरों के बीच अक्सर रोमांटिक रिश्ते बनते हैं, जो कई बार यौन संबंध तक पहुंच जाते हैं। सहमति से संबंध की रिपोर्ट तो कोई करेगा नहीं, लेकिन POCSO की धारा 19 के तहत अगर किसी को ऐसे किसी मामले की जानकारी है, तो उसे पुलिस को बताना अनिवार्य है। अगर वह नहीं बताता, तो उसे भी सजा मिलेगी। इस कारण रिपोर्ट करना माता-पिता की मजबूरी है। कई बार पैरंट्स को रिश्ता पसंद नहीं होता, इसलिए भी रिपोर्ट करते हैं। यह कानून लिंग निरपेक्ष है। कोई वयस्क महिला किसी किशोर के साथ संबंध बनाती है, तो उसे भी दंडित किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: शोषण रोकना उचित है, लेकिन किशोरों को सहमति से सेक्स की आजादी न देना और ऐसा करने पर उन्हें अपराधी बना देना किसी तरह सही नहीं लगता। इस वजह से कई बार बहुत बड़ा अन्याय हो जाता है। हाल ही में ऐसा एक मामला पश्चिम बंगाल से सामने आया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि आपसी सहमति से बनाए गए यौन संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर विचार किया जाए।

यह है केस: यह मामला 2018 का है। उस समय लड़की की उम्र 14 साल थी और उसका रिश्ता 25 साल के युवक से बन गया। कुछ समय बाद उसने एक बेटी को जन्म दिया। जब यह बात सामने आई, तो युवक को गिरफ्तार कर लिया गया। निचली अदालत ने उसे POCSO और भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत बलात्कार व अन्य अपराधों का दोषी ठहराया। बाद में कोलकाता हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई की और कुछ आरोप तो हटा दिए, लेकिन बाकी मामलों में उसकी 20 साल की सजा बरकरार रखी।

मानवीय पहलू: इस मामले में कोलकाता उच्च न्यायालय की कुछ टिप्पणियों पर विवाद हुआ, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसका खुद संज्ञान लिया। शीर्ष अदालत ने इस फैसले को समाज और न्यायिक व्यवस्था की एक बड़ी विफलता बताया। कोर्ट ने कहा, 'अब व्यवस्था पीड़िता के लिए यह सुनिश्चित करे कि उसकी पढ़ाई पूरी हो, जिंदगी आराम से जिए, उसकी बेटी को बेहतर शिक्षा मिले और परिवार को जीने का अच्छा माहौल मिले।' इन्हीं वजहों से अदालत ने अभियुक्त को दोषी ठहराए जाने को सही माना, लेकिन इस आधार पर सजा देने से इनकार कर दिया कि इससे सबसे ज्यादा कष्ट पीड़िता को होगा।

अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल: सुप्रीम कोर्ट का साफ मानना है कि अगर किशोर आपसी सहमति से यौन संबंध बनाते हैं, तो सुरक्षा मिलनी चाहिए, जेल नहीं। POCSO एक्ट का मकसद ऐसे मामलों को अपराध बनाना नहीं है। अदालत का विचार बिल्कुल सही है, लेकिन उसने यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दिया है। यह एक असाधारण शक्ति है, जो शीर्ष अदालत को 'पूर्ण न्याय' करने के लिए दी गई है।

संरक्षण की जरूरत: अगर अदालत महसूस करती है कि कानून के कारण उसके हाथ बंधे हैं, तो एक समझदार जज तथ्यों को इस तरह प्रस्तुत करता है कि उसी कानून के तहत न्याय हो सके। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ निचली अदालतों ने भी अभियुक्तों को राहत दी है, जिन्हें अनुच्छेद 142 जैसी असाधारण शक्ति प्राप्त नहीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि प्यार एक मौलिक मानवीय अनुभव है और किशोरों को भावनात्मक रिश्ते बनाने का हक है। मद्रास हाईकोर्ट ने 2001 में ही फैसला दिया था कि हार्मोनल बदलाव के दौर से गुजर रहे नाबालिगों को माता-पिता और समाज से मार्गदर्शन व संरक्षण मिलना चाहिए।

उम्र पर विवाद: जब सहमति की उम्र को 16 से बढ़ाकर 18 करने का विधेयक लाया गया, तो काफी विरोध हुआ था। इसलिए इसमें 16 से 18 के बीच की उम्र के लिए सहमति से सेक्स की छूट का प्रावधान भी रखा गया था। लेकिन संसदीय समिति ने इसे इस आधार पर खारिज कर दिया कि तब यौन शोषण के मामले में यह लड़की को प्रमाणित करना होगा कि उसने सहमति नहीं दी थी।

बदले हालात: अब बच्चों के हाथों में मोबाइल और कंप्यूटर है, जिससे उन्हें हर चीज की जानकारी मिल रही है। वे जल्दी वयस्क हो रहे हैं। विभिन्न देशों में सहमति की उम्र कम है - ब्रिटेन में 16, फ्रांस में 15, स्पेन में 13, अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में 16 से 18। बच्चों को यौन शोषण से बचाना एक गंभीर चुनौती है, लेकिन सहमति से सेक्स पर जेल भेजना भी सही नहीं। शीर्ष अदालत की चिंता वाजिब है।

 

 
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