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देश को शर्मिंदा करते बेलगाम ट्रोलर्स,सोशल मीडिया का दायरा बड़ा लेकिन सोच छोटी.

 
  • Kunal Kataria
  • 15 May 2025
  • 1176
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 नई दिल्ली: सोशल मीडिया किस कदर टॉक्सिक हो सकता है, इसका बड़ा उदाहरण है विदेश सचिव विक्रम मिसरी की ट्रोलिंग। जिस अधिकारी ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के पक्ष को सधे और सटीक अंदाज में देश-दुनिया के सामने रखा, उसे ही ट्रोलर्स ने निशाना बना लिया। वजह बेवजह थी, बचाव का यह कोई तर्क है ही नहीं। सवाल है, अगर वजह होती तो भी क्या किसी के सम्मान पर इस तरह चोट करना सही है?

छोटी सोच: सोशल मीडिया का दायरा बड़ा हो रहा है, लेकिन सोच छोटी - और यह बात बार-बार साबित हो रही है। किसी पर कमेंट करते-करते ट्रोलर्स का हद के बाहर निकल जाना, मर्यादाओं को भूल जाना आम हो चुका है। इन्हें किसी का टैलेंट नहीं दिखता, किसी की मुस्कान चुभती है, किसी की सफलता रास नहीं आती, किसी की पहचान खलती है - और फिर शब्दों को जहर बनाकर ये सामने वाले को गिराने में लग जाते हैं।

कर्नल कुरैशी पर टिप्पणी: विक्रम मिसरी को निशाना बनाया गया, क्योंकि उन्होंने अपना काम ईमानदारी से किया। उन्हीं की तरह कर्नल सोफिया कुरैशी निशानी बनीं, जो ऑपरेशन सिंदूर का एक प्रमुख चेहरा हैं। असहज करने वाली ऑनलाइन टिप्पणियां तो हुईं ही उन पर, मध्य प्रदेश के मंत्री विजय शाह ने सार्वजनिक रूप से भी कुछ ऐसा बोल दिया, जिस पर केवल शर्मिंदा ही हुआ जा सकता है। अच्छा हुआ कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में सख्ती दिखाई और डीजीपी को केस दर्ज करने के निर्देश दिए हैं।

गरिमा का ख्याल नहीं: सोशल मीडिया कभी शर्मिंदा नहीं होता, और न ही वह पिछली गलतियों से कोई सीख लेता दिखाई देता है। उसे पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की पत्नी हिमांशी नरवाल या नैनीताल रेप केस मामले में पूरी मुस्लिम कम्युनिटी को निशाना बनाने का विरोध करने वाली शैला नेगी को ट्रोल करने में कोई हिचक नहीं होती। इसमें न एक महिला की गरिमा का ख्याल रखा जाता है और न कोई संवेदनशीलता दिखाई जाती है।

छिपकर हमला: सोशल मीडिया ने आम लोगों को अपनी बात रखने के लिए एक सशक्त प्लैटफॉर्म दिया है, लेकिन इसी वजह से ट्रोलर्स की फौज भी खड़ी हो गई है। कीबोर्ड से होने वाले संवाद में स्क्रीन चेहरे को छिपा देता है। यह अहसास वैसा ही है, जैसे भीड़ में खो जाना। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक जॉन सुलर का कहना है कि इंटरनेट पर मिलने वाली गुमनामी और रिएक्शन का डर न होने से लोग अधिक आक्रामक और असामाजिक व्यवहार करने लगते हैं। आमने-सामने की बातचीत में जो नहीं कहा जा सकता, उसे भी सोशल मीडिया पर लिखने से हिचक नहीं होती।

सख्त कानून चाहिए: सोशल मीडिया और ओटीटी ने गाली-गलौज को न्यू नॉर्मल का दर्जा दिला दिया है, लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने इस बात को समझते हुए साइबर बुलिंग और इंटरनेट पर हेट स्पीच रोकने के लिए सख्त कानून बनाए हैं। भारत में आईटी एक्ट, 2000 की धारा 66(A) में ऑनलाइन आपत्तिजनक पोस्ट करने के खिलाफ प्रावधान था। हालांकि 2015 के एक ऐतिहासिक केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर अनुचित रोक लगाता है। नए IT नियमों में कंपनियों की जवाबदेही और जिम्मेदारी तय की गई है, लेकिन जाहिर है कि इससे काम बन नहीं रहा।

लगाम जरूरी: भारतीय संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार दिया है। इसी अधिकार से वे सोशल मीडिया पर अपने विचार और मत व्यक्त करते हैं। लेकिन, यह अधिकार बेलगाम नहीं हो सकता। नैतिकता की रक्षा, अश्लीलता और मानहानि रोकने के लिए सीमाएं जरूरी हैं। सुप्रीम कोर्ट भी एक मामले में कह चुका है कि सोशल मीडिया इस्तेमाल करते समय इसके प्रभाव और पहुंच को लेकर ज्यादा सतर्क रहना चाहिए।

 

 
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