नागपुर: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने न्यायिक सक्रियता को लेकर अहम टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि न्यायिक सक्रियता जरूरी है, लेकिन इसे न्यायिक आतंकवाद नहीं बनने देना चाहिए। नागपुर जिला बार एसोसिएशन की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने यह बात कही। सीजेआई ने लोकतंत्र के तीनों स्तंभों के बीच संवैधानिक सीमाओं को बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर संस्था को संविधान की ओर से तय सीमाओं के भीतर काम करना चाहिए।
सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि वे संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करें। जब संसद या विधानसभाएं ऐसे कानून बनाती हैं जो संविधान का उल्लंघन करते हैं, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है। हालांकि, न्यायपालिका को दूसरे स्तंभों के कामकाज में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
चीफ जस्टिस गवई ने आगे ये भी कहा कि न्यायिक सक्रियता बनी रहनी चाहिए। हालांकि, इसे न्यायिक दुस्साहस और न्यायिक आतंकवाद यानी ज्यूडिशियल टेरर में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इसका मतलब है कि अदालतें सक्रिय होकर काम कर सकती हैं, लेकिन उन्हें अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए। इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के कई जज, बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस आलोक अराधे और अन्य हाईकोर्ट जज भी मौजूद थे।
इस मौके पर सीजेआई गवई की मां कमलताई और पत्नी तेजस्विनी भी मंच पर थीं। जस्टिस गवई ने कहा कि हर संस्था को संविधान के दायरे में रहकर काम करना चाहिए। न्यायपालिका को दूसरे अंगों के काम में बिना वजह दखल नहीं देना चाहिए। जब संसद या विधानसभाएं ऐसे कानून बनाती हैं जो संविधान का उल्लंघन करते हैं, तो न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है। लेकिन, न्यायपालिका को अन्य स्तंभों के कामकाज में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।