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पूर्ण बहुमत को ताकते रह गए हरीश रावत, कांग्रेस ने दे दिया था अलग सीएम, क्या आप जानते हैं 2012 का वो किस्सा.

 
  • Rahul Parasar
  • 03 Sep 2025
  • 686
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देहरादून: उत्तराखंड में कांग्रेस को जब भी जनादेश मिला तो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नेताओं की टक्कर जोरदार रही। एक तरफ जहां कई नेता हाईकमान की चरण वंदना में जुट जाते हैं। दूसरी तरफ कोई और ही नेता बाजी मार ले जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ था कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के साथ। उनका नाम हर बार आगे रहता है, लेकिन बाजी कोई और ही मार ले जाता है। अब 2027 की आहट के साथ ही वे एक बार फिर मैदान सक्रिय नजर आ रहे हैं।
 

फिरता रहा अरमानों पर पानी

उत्तराखंड में जब वर्ष 2002 में कांग्रेस की सरकार बनी थी। उस समय भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत सीएम बनने की दौड़ में शामिल थे, लेकिन तब हाईकमान ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश की कमान संभाल चुके पं. नारायण दत्त तिवारी को सत्ता की कुर्सी सौंप दी। हरीश रावत को इसकी एवज में राज्यसभा भेजा गया।

इसके बाद जब प्रदेश में वर्ष 2012 के चुनाव में जनता ने एक बार फिर से कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया तो वही सीएम की दौड़ ने फिर हाईकमान की गणेश वंदना करवाई। इस बार भी प्रदेश का मुखिया बनने का ख्वाब, ख्वाब बन कर रह गया।

2012 में क्या हुआ?

वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में कांग्रेस को बहुमत मिला। उस समय हरीश रावत 15वीं लोकसभा के सदस्य थे। मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री के रूप में कार्यरत थे। हरीश रावत केंद्रीय मंत्री रहते हुए भी राज्य में मुख्यमंत्री बनने की चाहत रखे हुए थे। उन्होंने अपने साथ बहुमत विधायकों को लिया। दिल्ली तक शक्ति प्रदर्शन किया। लेकिन, इस बाजी हाथ लगी कांग्रेस नेता विजय बहुगुणा को। विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने।

हालांकि, 2013 की आपदा ने उनकी कुर्सी छीन ली। वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा के बाद जब मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की काफी किरकिरी हुई। इसके बाद हाईकमान ने इसका समाधान विजय बहुगुणा को हटा कर किया। इसके बाद प्रदेश की सत्ता पर हरीश रावत की ताजपोशी हुई। इसके साथ ही उनकी सीएम बनने की इच्छा भी पूरी हुई।
 

कांग्रेसियों में बढ़ी नाराजगी

हरीश रावत मुख्यमंत्री तो बन गये, लेकिन उनके वन मैन शो के चलते कांग्रेसियों में नाराजगी बढ़ती चली गयी। इसी दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के खिलाफ एक स्टिंग ऑपरेशन सामने आया, जिसमें विधायकों के खरीद-फरोख्त की बात दिखायी गयी थी। 2014 में सीएम बने हरीश रावत को 2016 में उनके अपनों ने ही उनको धोखा दे दिया। उत्तराखंड में तख्तापलट की पूरी कोशिश की गयी।

पूर्व सीएम विजय बहुगुणा और कांग्रेस नेता हरक सिंह रावत, रेखा आर्य, अमृता रावत, डॉ शैलेंद्र मोहन सिंघल, कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन, सुबोध उनियाल, प्रदीप बत्रा, शैला रानी रावत और उमेश शर्मा 'काऊ' ने तत्कालीन सीएम हरीश रावत के खिलाफ बगावत कर दी। ये सभी बाद में भाजपा में शामिल हो गए। यह घटनाक्रम यहीं नहीं थमा, बल्कि राजनीतिक संकट को देखते हुए उत्तराखंड में पहली बार राष्ट्रपति शासन भी लगाया गया।
 

2016 में इस तरह रहा घटनाक्रम

18 मार्च 2016 को राज्य विधानसभा में विनियोग विधेयक पर विपक्षी पार्टी भाजपा ने मत विभाजन की की मांग की, जिसका कांग्रेस के 9 विधायकों ने समर्थन किया। इसके बाद प्रदेश में राजनैतिक संकट पैदा हो गया। राज्यपाल ने हरीश रावत सरकार को 28 मार्च 2016 को बहुमत साबित करने को कहा। इसके बाद एक निजी चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन किया, जिसमें मुख्यमंत्री रावत खुद 28 मार्च 2016 को होने वाले विश्वास मत हासिल करने के लिए पार्टी के बागी विधायकों के साथ कथित तौर पर सौदेबाजी करते नजर आए।

केंद्र ने इसी को आधार बनाते हुए फ्लोर टेस्ट से एक दिन यानी 27 मार्च 2016 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया। कांग्रेस ने राष्ट्रपति शासन के खिलाफ उत्तराखंड हाई कोर्ट की एकल पीठ में अपील की। कोर्ट ने अपने फैसले में बहुमत साबित करने की तारीख आगे बढ़ाकर 31 मार्च 2016 कर दी। राज्य की ओर दायर की गई अपील के विरोध में केंद्र ने उत्तराखंड हाई कोर्ट की डबल बेंच में अपील की।

इसके बाद कोर्ट ने 30 मार्च 2026 को शक्ति परीक्षण के अपने ही आदेश पर रोक लगा दी। सुनवाई की तारीख 6 अप्रैल 2016 तय कर दी। नैनीताल हाई कोर्ट ने 21 अप्रैल 2016 को राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्य में 18 मार्च 2016 से पहले की स्थिति बनी रहेगी। केंद्र ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

बहुमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे लगा दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने हरीश रावत को 29 अप्रैल 2016 को विधानसभा में बहुमत साबित करने का भी आदेश दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के 9 बागी विधायकों की सदस्यता समाप्त किए जाने के आदेश को बरकरार रखा।
 

सुप्रीम कोर्ट का वो आदेश

6 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट कहा कि हरीश रावत 10 मई 2016 को फ्लोर टेस्ट देंगे और इस दौरान कांग्रेस के 9 बागी विधायक वोटिंग में हिस्सा नहीं ले सकेंगे। 10 मई 2016 को राज्य के मुख्य सचिव की देखरेख में उत्तराखंड विधानसभा में फ्लोर टेस्ट हुआ। मतों को सीलबंद कर सुप्रीम कोर्ट के लिए भेज दिया गया। 11 मई 2016 को सुप्रीम ने पाया कि रावत सरकार के पक्ष में 33 और विपक्ष में 28 मत मिले हैं। इस तरह उत्तराखंड में चल रहे सियासी संकट का अंत हो गया।

इसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए राष्ट्रपति से सिफारिश कर दी। अब एक बार फिर पूर्व सीएम कांग्रेस के कार्यक्रमों में साथ ही नेताओं की गलबहियां करते हुए नजर आ रहे हैं। इसको देखते हुए सियासी चर्चाएं है कि हरीश रावत बार फिर से चुनाव के लिए सक्रिय हो गए हैं।

 

 
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