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गंगा नदी 1300 सालों के भीषण सूखे के दौर से गुजर रही, IIT की स्टडी रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, जल सुरक्षा बना मुद्दा.

 
  • Rahul Parasar
  • 27 Sep 2025
  • 979
image  

 

देहरादून: गंगा नदी भीषण सूखे के दौर से गुजर रही है। आईआईटी की स्टडी रिपोर्ट ने साफ किया है कि नदी 1300 वर्षों के सबसे भीषण सूखे के दौर से गुज रही है। अमेरिका आधारित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (PNAS) में प्रकाशित एक हालिया स्टडी में यह बात सामने आई है। स्टडी रिपोर्ट कहती है कि भारत, नेपाल और बांग्लादेश के 60 करोड़ से अधिक लोगों की जीवनरेखा गंगा नदी 1300 वर्षों में अपने सबसे गंभीर सूखे के दौर से गुजर रही है। भविष्य में तापमान बढ़ने के साथ इसमें बड़े जल विज्ञान संबंधी बदलाव आने की संभावना है। दरअसल, गंगा नदी उत्तराखंड के गंगोत्री से निकलकर बंगाल की खाड़ी से मिलती है। इस दौरान यह उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल के बड़े भाग को पार करती है। इन प्रदेशों के गंगा बेसिन इलाके देश के सबसे उपजाऊ इलाकों में जाने जाते हैं।

स्टडी रिपोर्ट में आया मामला

गंगा नदी में सूखे के संकट की इस रिपोर्ट और निष्कर्षों ने दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक में जल सुरक्षा, कृषि और बिजली उत्पादन के लिए गंभीर चिंताएं उत्पन्न कर दी हैं। आईआईटी गांधीनगर और एरिजाना यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर्स ने यंत्रों से प्राप्त आंकड़ों, पालियो क्लाइमेट रिकॉर्ड और उन्नत जलविज्ञान मॉडल का उपयोग करके पिछली 13 शताब्दियों में गंगा नदी के प्रवाह का पुनर्निर्माण किया।

रिसर्च टीम को विश्लेषण से पता चला कि 1990 के दशक की शुरुआत से नदी का जलस्तर 16वीं और 18वीं शताब्दी के भीषण सूखे से भी कहीं अधिक तीव्र है। आईआईटी गांधीनगर के प्रमुख लेखक दीपेश सिंह चुफाल ने कहा कि पिछले तीन दशकों में गंगा नदी को लगातार और लंबे समय तक सूखे का सामना करना पड़ा है। इसमें 2004-2010 का सूखा एक सहस्राब्दी (एक हजार साल) से भी अधिक समय में सबसे गंभीर सूखा था।

स्टडी में दो भीषण सूखे का जिक्र

स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि 1991 और 2020 के बीच इस बेसिन ने दो अभूतपूर्व सात वर्षीय सूखे झेले। पहला सूखा वर्ष 1991 से 1997 और दूसरा सूखा वर्ष 2004 से 2010 के बीच आया। इसने बेसिन के 1300 साल के इतिहास में दस सबसे लंबे सूखे में से एक हैं। हालांकि, सूखे मुख्य रूप से प्राकृतिक मानसून परिवर्तनशीलता से जुड़े थे। स्टडी ने मानव-चालित कारकों की प्रमुख भूमिका पर जोर दिया।

हिंद महासागर के गर्म होने और एरोसोल प्रदूषण के कारण आंशिक रूप से कमजोर होते ग्रीष्मकालीन मानसून ने 1950 के दशक से बेसिन में वर्षा में लगभग 10 फीसदी की कमी की है। पश्चिमी क्षेत्रों में भी बारिश में 30 फीसदी से अधिक की गिरावट देखी गई है।

स्टडी में दी गई चेतावनी

स्टडी रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान बेसिन के जल विज्ञान को और बदल सकते हैं। इसमें कहा गया है कि ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा में कमी नदी के प्रवाह में गिरावट का मुख्य कारण है, जबकि तापमान में वृद्धि का प्रभाव कम है। हालांकि, चरम जलवायु परिस्थितियों में अगर वर्षा की कमी उच्च तापमान के साथ मिलती है तो जलधारा प्रवाह में तेजी से गिरावट आ सकती है। यह गिरावट 5 फीसदी से 35 फीसदी तक रह सकती है।

बारिश को लेकर अनिश्चितता की भरपाई के लिए अत्यधिक भूजल पंपिंग ने नदी के जलस्तर को और कम कर दिया है। इससे आधार प्रवाह कम होने की बात सामने आई है। इस कारण गर्मियों में जलभराव बढ़ गया है। शोधकर्ताओं ने कहा कि घटती वर्षा और भूजल के असंतुलित उपयोग का संयुक्त प्रभाव गंगा को उसकी प्राकृतिक सीमाओं से परे धकेल रहा है।

दिखने लगे हैं परिणाम

गंगा बेसिन में घटते भूजलस्तर के परिणाम पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। वर्ष 2015 और 2017 के बीच ऐतिहासिक रूप से कम जल स्तर ने पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, बिजली उत्पादन और नौवहन को बाधित किया। इससे 12 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए। मीठे पानी के प्रवाह में गिरावट बंगाल की खाड़ी में पोषक तत्वों के प्रवाह को भी कम कर रही है। इससे दुनिया के सबसे उत्पादक समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों में से एक को खतरा है।

निष्कर्षों को और भी चिंताजनक बनाने वाली बात यह है कि अधिकांश वैश्विक जलवायु मॉडल इस शुष्कता की प्रवृत्ति को समझने में विफल रहे हैं। कई मॉडल वर्षा में अपेक्षित वृद्धि के कारण बढ़ते तापमान परिदृश्यों में जलधारा प्रवाह में वृद्धि का अनुमान लगाते हैं। केवल कुछ ही मॉडल इस गिरावट का अनुकरण करते हैं। इससे भविष्य के जल पूर्वानुमानों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा होता है।

क्या कहते हैं सह लेखक?

स्टडी के को-राइटर आईआईटी गांधीनगर के प्रोफेसर विमल मिश्रा ने कहा कि गंगा बेसिन में भविष्य की जल सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि हम जलवायु विज्ञान को नीति और स्थानीय जल प्रबंधन के साथ कितनी प्रभावी ढंग से एकीकृत करते हैं। कुछ अनुमानों ने सुझाव दिया है कि जलवायु परिवर्तन के तहत बढ़ती वर्षा 2040 तक शुष्कता को उलट सकती है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने आगाह किया है कि मानवीय हस्तक्षेप के बिना ऐसा सुधार संभव नहीं हो सकता है। विशेष रूप से भूजल दोहन के बेहतर प्रबंधन के बिना यह संभव नहीं है।

दरअसल, गंगा बेसिन भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 40 फीसदी का योगदान देता है। यह देश के कृषि क्षेत्र को बनाए रखता है। लंबे समय तक सूखे की बढ़ती घटनाओं के कारण स्टडी में जल प्रशासन, बेहतर मानसून पूर्वानुमान और सतत भूजल प्रबंधन में तत्काल सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

 

 
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