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मसूरी की पहाड़ियों में गूंजी थी इंदिरा गांधी की बुलंद आवाज, ये है 1982 की जीत की कहानी.

 
  • Shubham Sehgal
  • 20 Nov 2025
  • 906
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देहरादून: देश आजाद भारत की लौह महिला इंदिरा गांधी को याद कर रहा है, तो मसूरी के लोग उनके जन्मदिन के अवसर पर मसूरी में उन सुनहरे पलों को स्मरण कर रहे हैं। यह पहाड़ी शहर इंदिरा जी और अपने पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू की ऐतिहासिक मौजूदगी का साक्षी बना था। 1920 के दशक से लेकर 1982 तक मसूरी ने उनके कई दौरों को देख हर दौरा इतिहास की एक नई पंक्ति जोड़ गया।

1920 के दशक में पंडित नेहरू अपनी पत्नी कमला नेहरू और तीन वर्ष की नन्ही इंदिरा के साथ अक्सर मसूरी आते थे। नेहरू स्वतंत्रता आंदोलन में पूरी तरह व्यस्त थे। जेल आते-जाते थे, लेकिन अपनी बच्ची को लिखे पत्रों के माध्यम से वे उसे राजनीतिक समझ, दूरदर्शिता और दृढ़ता का पाठ पढ़ाते रहे। यही वह दौर था जब इंदिरा एक संवेदनशील, मजबूत और विवेकशील व्यक्तित्व के रूप में आकार ले रही थीं। बचपन से ही इंदिरा को नेहरू ने राजनय, कूटनीति और शासन की बारीकियां सिखाईं। विदेश यात्राओं पर वे अक्सर पिता के साथ जाती थीं। इसीने उन्हें एक परिपक्व, निर्णय लेने वाली और लोहे की तरह मजबूत नेता बनाया, जिसने 1966 में प्रधानमंत्री पद संभालते ही देश को नई दिशा दी। 1958 में इंदिरा गांधी, प्रधानमंत्री नेहरू के साथ पंचेन लामा से मुलाकात के लिए मसूरी आईं। यह बैठक सवाय होटल में हुई और इसे भारत-तिब्बत संबंधों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

भविष्य की चिंता

1963 में इंदिरा गांधी मसूरी आई तिब्तन होमस् फाउडेंशन की पहली गवर्निंग बॉडी बैठक में शामिल होने। वह इसके संस्थापक सदस्यों में थीं और दलाई लामा अध्यक्ष थे। अगले वर्ष 1964 में भी वे संगठन की प्रगति देखने पहुंचीं। तिब्बती शरणार्थी बच्चों की शिक्षा विशेषकर हैप्पी वैली का स्कूल उनकी गहरी रुचि का विषय था।

इंदिरा गांधी का भव्य स्वागत

1974 में प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी का मसूरी में भव्य स्वागत हुआ। उसी वर्ष उन्होंने प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान का नाम बदलकर लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी रखने का ऐतिहासिक निर्णय घोषित किया। हैप्पी वैली मैदान में उनका सार्वजनिक संबोधन आज भी बुजुर्गों की स्मृतियों में ताजा है। मषूहर इतिहासकर गोपाल भारद्वाज ने बताया कि पहाड़ों ने उस दिन सचमुच एक करिश्माई नेता की आवाज सुनी थी।

मसूरी पहुंचीं इंदिरा गांधी

1980 में इंदिरा गांधी एक बार फिर मसूरी पहुंचीं। इस बार उनके साथ सोनिया गांधी भी थीं। उन्होंन तिब्तन होमस् फाउडेंषन और वहां बने केंद्रीय विद्यालय का निरीक्षण किया और बच्चों से मुलाकात की। उनका यह दौरा मानवीय संवेदनशीलता और करुणा का प्रतीक बन गया। इंदिरा गांधी का अंतिम दौरा 1982 में हुआ। यह वह समय था जब हाथीपांव क्षेत्र में चल रही चूना-पत्थर खदानें मसूरी की पहाड़ियों को तेजी से नष्ट कर रही थीं। हवा प्रदूषित हो रही थी, पेड़ कट रहे थे और पर्वत अपनी प्राकृतिक सुंदरता खो रहे थे। इंदिरा गांधी ने इस खतरे को समझते हुए कड़ा निर्णय लिया और खनन रोकने के लिए सरकार को तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए। उनकी पहल पर सुप्रीम कोर्ट ने 1982 में खदानों को बंद करने का आदेश दिया। मसूरी की जनता ने इस फैसले के बाद राहत की सांसे लीं। स्थानीय लोग आज भी कहते हैं कि अगर इंदिरा गांधी न होतीं, तो शायद मसूरी की हरियाली हमेशा के लिए मिट चुकी होती।
 

गोपाल भारद्वाज बोले

इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने कहा कि इंदिरा गांधी की यात्राओं ने मसूरी की पहचान, संस्कृति और पर्यावरण कृतीनों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। उन्होंने यहां के लोगों की समस्याओं को समझा, तिब्बती समुदाय की मदद की और सबसे बढ़कर पहाड़ियों को विनाश से बचाया। यही कारण है कि मसूरी के लोग पूरे सम्मान के साथ कहते हैं कि यह शहर इंदिरा गांधी का हमेशा ऋणी रहेगा।

 

 
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