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  • यूपी में 'ब्राह्मण के शंख' से होगा हाथी का कमबैक? मायावती का 'प्लान-2027' बढ़ाएगा BJP-SP की टेंशन

यूपी में 'ब्राह्मण के शंख' से होगा हाथी का कमबैक? मायावती का 'प्लान-2027' बढ़ाएगा BJP-SP की टेंशन.

 
  • Kunal Kataria
  • 15 Jan 2026
  • 1042
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लखनऊ। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी की मुखिया मायावती का आज जन्मदिन है। अपने जन्मदिन के मौके पर मायावती ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और भविष्य की सियासत के कुछ संकेत दिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मायावती ने प्रदेश में ब्राह्मण समाज की उपेक्षा का मुद्दा उठाया और साथ ही साथ गठबंधन को लेकर बड़ी बातें कहीं। लेकिन, यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में शून्य पर सिमटने वाली और सिंगल डिजिट (9.32 फीसदी) वोट शेयर वाली बीएसपी का मायावती क्या फिर से कमबैक करा पाएंगी, या ये मान लिया जाए कि 'हाथी' की चाल अब थम गई है?

सबसे पहले आपको बताते हैं कि मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में क्या-क्या कहा। बीएसपी की मुखिया ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो मुख्य बातें कहीं, इनमें पहली थी- हाल ही में हुई ब्राह्मण समाज के विधायकों की बैठक का मुद्दा। मायावती ने कहा कि प्रदेश की मौजूदा सरकार में ब्राह्मण समाज को उपेक्षित किया जा रहा है और उचित भागेदारी नहीं मिल रही। उन्होंने कहा कि बीएसपी ने हमेशा ब्राह्मण समाज को पूरा सम्मान और प्रतिनिधित्व दिया है।

दूसरी अहम बात मायावती ने सियासी गठबंधन को लेकर कही। मायावती ने कहा कि आने वाला विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव बीएसपी बिना किसी गठबंधन के अकेले ही लड़ेगी। उन्होंने कहा कि इस बारे में किसी को कोई गलतफहमी नहीं रखनी चाहिए। हालांकि, मायावती ने कहा कि आगे चलकर अगर उन्हें लगा कि कोई दल अपने वोट को, खासकर सवर्ण वर्ग के वोटरों को बीएसपी में ट्रांसफर करा सकता है, तो उस समय गठबंधन किया जा सकता है। मतलब साफ है कि मायावती ने गठबंधन को लेकर कुछ संभावनाएं खुली रखी हैं।

2022 या 2024 के आधार पर आंकलन करना नासमझी

अब बात करते हैं बीएसपी के सियासी भविष्य पर और उस सवाल पर, जो मायावती की राजनीति को लेकर उठ रहा है। पिछले लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय से यूपी की सत्ता से बाहर हुईं मायावती की बीएसपी को 2022 के विधानसभा चुनाव में महज एक सीट पर जीत मिली और वोट शेयर 22.5 फीसदी से घटकर 13.6 फीसदी पर आ गया। इसके बाद बीएसपी 2024 के लोकसभा चुनाव में उतरी, लेकिन पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका। वोट शेयर भी घटकर सिंगल नंबर 9.32 फीसदी पर आ गया।

बीएसपी की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम बताते हैं कि 2022 या 2024 के नतीजों के आधार पर 2027 में मायावती का आंकलन करना नासमझी होगी। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी में शामिल होने और जुड़ने के लिए नेताओं की एक लंबी कतार थी। ओम प्रकाश राजभर हों, राम अचल राजभर हों, त्रिभुवन दत्त हों, स्वामी प्रसाद मौर्य हों, आरके चौधरी या इंद्रजीत सरोज हों, पूरे प्रदेश से दलित और पिछड़े समाज के नेता अखिलेश यादव के साथ जुड़े। अभी स्थिति अलग है।

journalist

वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम मानते हैं कि 2027 में मायावती एक बदली हुई रणनीति के साथ उतरेंगी

मुस्लिम मतदाता बड़ा फैक्टर

सैयद कासिम बताते हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद अखिलेश यादव का रुख सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ नजर आ रहा है, जिसे मुस्लिम वर्ग पसंद नहीं करेगा। सपा और बीएसपी दोनों के लिए, उत्तर प्रदेश में चुनाव के नतीजे बहुत हद तक मुस्लिम मतदाता तय करते हैं। 2022 में मुसलमानों ने बीएसपी को वोट नहीं दिया तो एक सीट मिली, सपा को दिया तो 111 सीटें मिल गईं। बिहार चुनाव में महागठबंधन को मुस्लिम वोट मिला, लेकिन बंटा भी। इसी का नतीजा है कि 14 फीसदी यादव वोट और बिहार में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद, आरजेडी सत्ता हासिल करने में नाकाम रही। यूपी और बिहार में जातियों का गणित और वोटिंग पैटर्न लगभग एक जैसा है। अंतर सिर्फ इतना है कि बिहार में यादव वोट ज्यादा हैं, यूपी में कम है।

यूपी में 2022 और 2024 के नतीजों के आधार पर बीएसपी के प्रदर्शन का आंकलन इसलिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि हाल ही में अक्टूबर में मायावती ने लखनऊ के अंदर एक विशाल रैली की है। ये रैली पूरी तरह से कार्यकर्ताओं के बल की रैली थी। रैली के लिए सिर्फ मायावती का नाम था, हाथी निशान था... और कुछ नहीं। लोग चंदा करके रैली में पहुंचे। सुबह 9 बजे रैली करने के बारे में शायद कोई दल सोचे भी ना, लेकिन मायावती ने की और दमदार तरीके से की।
 

'BSP के भीतर क्या चल रहा'

सैयद कासिम मानते हैं कि इसे बीएसपी की खासियत कहिए या कमी कहिए कि 'बीएसपी के अंदर' क्या चल रहा है, कोई देख नहीं सकता। मायावती के जन्मदिन पर बीएसपी ने आज 18 मंडलों में कार्यक्रम रखा है। कहीं 50 हजार लोग हैं, कहीं 20 हजार, कहीं 15 हजार तो कहीं 10 हजार, इस तरह की कार्यकर्ताओं की भीड़ है। ये एक बदली हुई रणनीति है और इसमें मायावती ने मुस्लिमों, ब्राह्मणों और पिछड़े वर्ग पर फोकस किया है। यहां आपको बता दें कि एक समय बीएसपी में नारा उठा था, 'ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी दिल्ली जाएगा'।

अब बात करते हैं मायावती के गठबंधन वाले बयान की। यूपी जैसे प्रदेश में बिना गठबंधन के चुनावी मैदान में उतरना हंसी-मजाक नहीं है। फिर मायावती क्यों अकेले लड़ने की बात कर रही हैं? दरअसल, मायावती ने गठबंधन पर बीजेपी, कांग्रेस और बाकी दलों का नाम तो लिया, लेकिन एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी के बारे में कोई बात नहीं की। ओवैसी इस समय एक बड़ी ताकत हैं। मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुले तौर पर कहा कि मुस्लिम और पिछड़े समाज के लोग बीएसपी की तरफ लौट रहे हैं। मायावती की इसी रणनीति में भविष्य की राजनीति के कई संकेत छिपे हैं, जिन्हें समझना आसान नहीं हैं।

 

 
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