देहरादून: उत्तराखंड में भूकंपीय मानचित्र का मामला गरमा गया है। दरअसल, देश में नए पेश किए गए सिस्मिक जोनेशन मैप और रिवाइज्ड अर्थक्वेक डिजाइन कोड को वापस लेने के केंद्र सरकार के फैसले से सिस्मोलॉजिस्ट और जियोलॉजिस्ट में चिंता बढ़ गई है। इनमें से कई ने कहा कि इस कदम से भविष्य में आने वाले बड़े भूकंप के लिए देश की तैयारी कमजोर हो सकती है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स की ओर से नवंबर 2025 में पेश किए गए रिवाइज्ड फ्रेमवर्क में भारत के सिस्मिक डिजाइन नॉर्म्स में बड़े अपडेट्स का प्रस्ताव था। इसमें पूरे हिमालयी आर्क को एक नए जोन VI– सबसे ज्यादा सिस्मिक रिस्क कैटेगरी में रखना शामिल है।
जियोलॉजिस्ट्स ने चेतावनी दी है कि भारत का सिस्मिक रिस्क बहुत कम नहीं है। कई एक्सपर्ट्स ने इसे वापस लेने को 'भारत की डिजास्टर रेजिलिएंस को मजबूत करने का एक चूका हुआ मौका' बताया। खासकर उन इलाकों में जिनके बारे में साइंटिस्ट्स ने लंबे समय से चेतावनी दी थी कि वहां खतरनाक भूकंप आ सकता है।
सीनियर जियोसाइंटिस्ट सीपी राजेंद्रन ने इसे वापस लेने को 'बुरा कदम' बताया। उन्होंने कहा कि हमें नहीं पता कि सरकार ने इतनी बड़ी पॉलिसी वापस क्यों ली। नया सिस्मिक कोड साइंटिफिक कम्युनिटी द्वारा भूकंप और भारत पर इसके संभावित असर के बारे में जमा की गई जानकारी पर आधारित था।
सीपी राजेंद्रन ने आगे कहा कि साइंटिस्ट्स ने बार-बार चेतावनी दी थी कि हिमालयी क्षेत्र में भविष्य में आठ या उससे भी बड़ा भूकंप आ सकता है। उन्होंने कहा कि नया कोड देश के सामने मौजूद असली भूकंप के खतरों को दिखाता है।
जियोलॉजिस्ट्स ने बताया कि भारत का सिस्मिक खतरा बहुत कम नहीं था। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, देश का लगभग 59 फीसदी जमीन का हिस्सा और लगभग 80 फीसदी आबादी मीडियम से बहुत ज्यादा सिस्मिक खतरे वाले जोन में आती है। उत्तराखंड स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के जियोलॉजिस्ट और पूर्व एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर पीयूष रौतेला ने कहा कि कोड में प्रस्तावित बदलाव देश की तैयारी को बेहतर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
पीयूष रौतेला ने कहा कि प्रस्तावित बदलाव भारत के सिस्मिक डिज़ाइन फ्रेमवर्क को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है ताकि देश के बने-बनाए माहौल को भविष्य के भूकंपों से बेहतर तरीके से बचाया जा सके।
एक्सपर्ट्स ने आगे कहा कि बदले हुए कोड में मजबूत सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं। इसमें बेहतर डिजाइन स्पेक्ट्रा, बेस शियर जरूरतों में 10-30 फीसदी की बढ़ोतरी, स्ट्रक्चरल गड़बड़ियों के लिए कड़े नियम और ज्यादा कड़े जियोटेक्निकल और डायनामिक एनालिसिस शामिल हैं।