नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी घमासान के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बड़ा एलान किया है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए सरकार को 2.87 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड सरप्लस ट्रांसफर करने की घोषणा की है। यह इस वित्त वर्ष में डिविडेंड से होने वाली आय के लिए नॉर्थ ब्लॉक के बजट अनुमानों से कम है। 31 मार्च, 2026 को समाप्त हुए वित्त वर्ष में आरबीआई की बैलेंस शीट 20.61% बढ़कर 91.97 लाख करोड़ रुपये हो गई।
आरबीआई के केंद्रीय निदेशक मंडल की 623वीं बैठक में डिविडेंड पेमेंट का फैसला लिया गया। इस बैठक की अध्यक्षता गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की। इस साल के केंद्रीय बजट में सरकार ने सरकारी उद्यमों से कुल डिविडेंड आय और केंद्रीय बैंक से सरप्लस ट्रांसफर के रूप में 3.16 लाख करोड़ रुपये का अनुमान लगाया था।
| 2025-26 | ₹2.87 लाख करोड़ |
| 2024-25 | ₹2.69 लाख करोड़ |
| 2023-24 | ₹2.1 लाख करोड़ |
| 2022-23 | ₹87,416 करोड़ |
मौजूदा व्यापक आर्थिक स्थितियों, बैंक के वित्तीय प्रदर्शन और पर्याप्त जोखिम बफर बनाए रखने की जरूरत का आकलन करने के बाद केंद्रीय बोर्ड ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए कंटिंजेंट रिस्क बफर (CRB) में ₹1,09,379.64 करोड़ ट्रांसफर करने की मंजूरी दी। वहीं, पिछले वर्ष यह रकम ₹44,861.70 करोड़ थी। बोर्ड ने CRB को RBI की बैलेंस शीट के आकार के 6.5 फीसदी पर बनाए रखने का भी फैसला लिया।
इस घोषणा से पहले अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया था कि आरबीआई का सरप्लस ट्रांसफर ₹2.7 लाख करोड़ से ₹3 लाख करोड़ के बीच रहेगा। इसे अक्सर केंद्रीय बैंक की ओर से सरकार को दिया जाने वाला डिविडेंड कहा जाता है। यह पिछले वर्ष के ₹2.69 लाख करोड़ के ट्रांसफर के बाद आया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 27% अधिक था।
रॉयटर्स की ओर से सर्वेक्षण किए गए अर्थशास्त्रियों के अनुसार, यह अप्रत्याशित लाभ नई दिल्ली को अपने 4.3% के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य से चूकने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।
हालांकि, यह भुगतान एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को एक महत्वपूर्ण राजकोषीय बफर प्रदान करेगा। कारण है कि ईरान युद्ध के चलते ऊर्जा की कीमतें बढ़ रही हैं। मार्च 2026 में खत्म हुए वित्त वर्ष में आरबीआई की गतिविधियों से मिला बढ़ा हुआ डिविडेंड मौजूदा वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार के खजाने को मजबूती देगा।
यह एक ऐसे अहम समय पर आया है, जब कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत के इंपोर्ट बिल को बढ़ा रही हैं। चालू खाता घाटा (CAD) को बढ़ रहा है। विदेशी फंड की बिकवाली को और तेज कर रही हैं।
इसका नतीजा घरेलू बाजारों में आर्थिक दबाव के रूप में पहले से ही दिख रहा है। बेंचमार्क 10-साल वाले बॉन्ड की यील्ड इस साल अब तक करीब 50 बेसिस पॉइंट चढ़कर मंगलवार को 7.10% पर पहुंच गई है। जबकि रुपया करीब 7% कमजोर है। इस करेंसी में गिरावट के चलते बाहरी घाटे को कम करने के मकसद से कई तरह के खर्च में कटौती के उपाय पहले ही अपनाए जा चुके हैं।
आरबीआई अपना डिविडेंड घरेलू निवेश, विदेशी-मुद्रा भंडार और करेंसी नोट छापने से होने वाली फीस से होने वाली कमाई से देता है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए डिविडेंड का भुगतान विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप और निवेश से होने वाली कमाई से मिले जबरदस्त मुनाफे से काफी हद तक संभव हो पाया।
खास तौर पर वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिकी डॉलर में करीब 10% की तेज गिरावट और सोने की कीमतों में 60% की उछाल ने आरबीआई की अकाउंटिंग से होने वाले मुनाफे में जबरदस्त सुधार किया। इससे रिकॉर्ड सरप्लस का रास्ता साफ हो गया।
इसके अलावा, अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि 2025-26 में आरबीआई की बैलेंस शीट में करीब 20% का विस्तार हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि केंद्रीय बैंक ने बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी डालने के लिए करीब ₹9 लाख करोड़ के बॉन्ड खरीदे थे। 2024-25 के आखिर में यह रकम ₹76.25 लाख करोड़ थी।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स के ट्रेजरी हेड अनिल भंसाली ने रायटर्स को बताया, 'सरकार यहां आरबीआई से कमाई करने के लिए नहीं है। टैक्स से कमाई करने के लिए है... फिलहाल, उसके पास अतिरिक्त राजस्व जुटाने का कोई और विकल्प नहीं है।'
लेकिन हर कोई इससे सहमत नहीं है।
एसटीएसआई प्राइमरी डीलर के मुख्य अर्थशास्त्री आदित्य व्यास ने कहा, 'हालांकि आरबीआई के डिविडेंड ने वित्त मंत्रालय को एक मजबूत सहारा दिया है। फिर भी सरकार की बैलेंस शीट को मजबूत करने और साथ ही खर्च की क्वालिटी में सुधार करने के लिए गंभीर प्रयास किए गए हैं।'
हालांकि, बैलेंस शीट में जबरदस्त विस्तार से स्वाभाविक रूप से कमाई बढ़ी। लेकिन, अंतिम भुगतान का आकार काफी हद तक आरबीआई के आंतरिक भंडार पर निर्भर था। सरप्लस ट्रांसफर संशोधित आर्थिक पूंजी ढांचे (ECF) से कंट्रोल होता है। इसमें यह शर्त है कि आकस्मिक जोखिम बफर (CRB) को RBI की कुल बैलेंस शीट के 4.5% से 7.5% की सीमा के भीतर बनाए रखा जाना चाहिए।
वित्त वर्ष 2025-26 में आरबीआई ने CRB को 7.5% की अधिकतम सीमा पर बनाए रखने का फैसला लिया। जैसा कि अर्थशास्त्रियों ने घोषणा से पहले बताया था, केंद्रीय बोर्ड की ओर से इस बफर को ऐतिहासिक मध्य-से-निचली सीमा की ओर कम करने का कोई भी फैसला सरकार के लिए डिविडेंड पेमेंट में ऑटोमैटिक ही बढ़ोतरी कर देगा।
आखिरकार जबकि ये भुगतान सरकार के गैर-कर राजस्व को महत्वपूर्ण बढ़ावा देते रहते हैं, अंतिम आंकड़ा सरकारी खजाने को भरने और केंद्रीय बैंक की वित्तीय मजबूती को बनाए रखने के बीच के नाजुक संतुलन को उजागर करता है।