देहरादून: उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के वर्ष 2016 के आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही, मामले को नए सिरे से विचार के लिए हाई कोर्ट के पास वापस भेज दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंगल में आग जैसे मामलों में लगातार निगरानी की आवश्यकता होती है। इसके लिए क्षेत्राधिकार वाला हाई कोर्ट अधिक उपयुक्त मंच है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि दिसंबर 2016 में हाई कोर्ट की ओर से जारी निर्देशों पर मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। अब लगभग एक दशक बीत चुका है। इस दौरान जमीनी परिस्थितियों में काफी बदलाव आया है। ऐसे में पुराने निर्देशों की वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार समीक्षा किए जाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जंगल की आग की समस्या पर निरंतर निगरानी आवश्यक है, जिसे उत्तराखंड हाईकोर्ट अधिक प्रभावी ढंग से कर सकता है क्योंकि उसे स्थानीय परिस्थितियों, भौगोलिक संरचना और क्षेत्रीय चुनौतियों की बेहतर जानकारी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश उत्तराखंड सरकार की ओर से हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर अपील और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव दत्ता की ओर से दायर आवेदन पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। राजीव दत्ता ने उत्तराखंड में लगातार सामने आ रही वनाग्नि की घटनाओं को लेकर अदालत का ध्यान आकर्षित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का 2016 का आदेश रद्द करते हुए कहा कि मामला फिर से हाई कोर्ट को भेजा जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट बदली हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए नए सिरे से विचार करे। आवश्यकता अनुसार संशोधित दिशा-निर्देश जारी करे। अदालत ने यह भी अनुरोध किया कि हाई कोर्ट उचित अवधि तक इस मामले की निगरानी करता रहे।
उत्तराखंड सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वकील जतिंदर कुमार सेठी ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में वनाग्नि की घटनाओं में कमी आई है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने आग की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कई प्रभावी कदम उठाए हैं। हाई कोर्ट के कुछ निर्देशों का पालन भी किया जा चुका है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में एक मजबूत और स्थायी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए, ताकि जंगलों में लगने वाली आग पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सके।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि वनाग्नि कई कारणों से लगती है। कभी यह प्राकृतिक कारणों से होती है, तो कई बार मानवीय लापरवाही या वन माफियाओं की गतिविधियों के कारण भी आग फैलती है।
दरअसल, दिसंबर 2016 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जंगलों, पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। इनमें केंद्र सरकार को राष्ट्रीय वन नीति तैयार करने, राज्य सरकार को गर्मियों में कम से कम 10 हजार फायर वॉचर्स नियुक्त करने, जंगल की आग रोकने के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराने और जानबूझकर आग लगाने वालों के खिलाफ कड़े कानून बनाने के निर्देश शामिल थे। अब इन सभी निर्देशों पर उत्तराखंड हाई कोर्ट नए सिरे से विचार करेगा