उत्तरकाशी : उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां की संस्कृति और परंपरा सबसे अनोखी और खास है, जिसे आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी निभा रहे हैं। ऐसी ही एक खास परंपरा है उत्तरकाशी के टकनोर क्षेत्र के गांवों का हारदूध मेला। जो कि प्रकृति के साथ नाग देवता और सोमेश्वर देवता को पशुओं की रक्षा करने के लिए धन्यवाद करने के लिए पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
उत्तरकाशी जिले के सीमांत गांवों मुखबा, धराली, भंगेली समेत उपरी टकनौर के गांवों में महिलाएं 5 दिन से अपने दुधारू गाय का दूध इकट्ठा करती हैं। इसके बाद सावन मास के 20 और 21 गते को घरों में स्थानीय व्यंजन और पकवान बनाए जाते हैं। देवताओं और डोलियों के लिए ब्रह्रमकमल फूल लाए जाते हैं। ब्रह्मकमल हिमालय के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक अत्यंत दुर्लभ, पवित्र और दिव्य फूल है।
यह उत्तराखंड का राजकीय पुष्प भी है, जो कि समुद्र तल से 3,000 से 4,800 मीटर की ऊंचाई पर पथरीली ढलानों और बुग्यालों में उगता है। इसके बाद सोमेश्वर देवता के मंदिर प्रांगण में इकट्ठा होते हैं। मंदिर प्रांगण को फूलों से सजाया जाता है। हर महिला अपने घर से दूध लाकर मंदिर प्रांगण में बैठ जाती हैं। इसके बाद पुजारी सोमेश्वर की डोली के सामने ही हर महिला का लाया हुआ दूध देवता को समर्पित करते हैं। बाद में इस दूध को पूरे गांव को प्रसाद स्वरूप बांटा जाता हैं। फिर महिलाएं और पुरूष स्थानीय वाद्य संगीत के साथ रासौ नृत्य के साथ रात और अगले दिन भी नृत्य करते हैं।
मुखबा गांव के सत्येंद्र सेमवाल बताते हैं कि इस मेले की शुरूआत कब से हुई इसको लेकर कुछ स्पष्ट नहीं है लेकिन कई सालों से कई पीढ़ियां इस परंपरा को आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाती आ रही हैं। उन्होंने बताया कि इस सीजन में हर तरफ हरियाली रहती है साथ ही गाय और पशुओं के लिए परचूर मात्रा में घास और भोजन रहता है। इस वजह से साल भर जानवरों की रखवाली और उनका विशेष ध्यान रखने के लिए स्थानीय देवता नाग और सोमेश्वर देवता को धन्यवाद कहते हैं।
इसके बाद से पूरे क्षेत्र में सेलकू पर्व की तैयारी भी शुरू हो जाती है। बताते चलें कि पिछले साल इसी मेले के दिन दिन में धराली में आपदा आई थी, मेले में शामिल होने की वजह से कई लोगों की जान भी बची। जिस वजह से मेले पर अब स्थानीय लोंगों की आस्था और बढ़ गई है।